हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं
दोस्तो
काफ़ी दिनों से इतने अच्छे ब्लाग पढ़ने के बाद दोचा कि मैं भी अपना योग दूँ. इसलिये यह मेरी पहली पोस्ट आपके समक्ष प्रस्तुत है. एक गज़ल के साथ
न जाने कितने दरद सजाकर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं
छुपाये कुछ, कुछ किये उजागर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं
जो रह गया है परे पलक के वो कोई दामन था या भरम था
अजीब से यों सवाल लाकर हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं
जो रक्सां है हर हरफ़ हरफ़ में, वो ख्याल है किस मुजस्सिमे का
कि जिसकी रंगत चुरा चुरा कर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं
हाँ शोख नजरों की चंद अनियाँ, कभी इधर से गुजर गईं थीं
ये मौसमों को गवाह बना कर हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं
ये दीद-ए-तर जो देखते हो, नहीं हैं रंजो-गमों की खातिर
रुला गया कोई याद आकर, जो अपनी गज़लों में रख रहे हैं
जो नजरें अपनी चुरा के गुजरे,हमारा तआर्रुफ़ थे कुछ दिनों तक
उन्हीं लम्हों की मजार लाकर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं
उमर के शफ़्फ़ाक दरपनों में, पड़ी हैं जितनी दरार अब तक
उन्ही की किरचें उठा उठा कर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं
ये नज़्में, गज़लें, कतए, रुबाई, सभी हैं रूदादे - ज़िन्दगी बस
यही तरन्नुम में अपने गाकर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं
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बढ़िया! बहुत खूब! स्वागत है आपका लिखना शुरू करने पर। योगदान नियमित देती रहें।
ये दीद-ए-तर जो देखते हो, नहीं हैं रंजो-गमों की खातिर
रुला गया कोई याद आकर, जो अपनी गज़लों में रख रहे हैं
बहुत सुन्दर गज़ल से शुरुआत की आपने,
हिन्दी चिट्ठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है अरूणिमा जी।
बहुत अच्छा लिखा है आपने।
घुघूती बासूती
बहुत बढ़िया. बधाई. लिखती रहें.
“उमर के शफ़्फ़ाक दरपनों में, पड़ी हैं जितनी दरार अब तक
उन्ही की किरचें उठा उठा कर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं”
बहुत खूब! स्वागत है।
बढ़िया गज़ल से शुरुवात की आपने, लेकिन आपका परिचय वाला पन्ना तो कोरा है।
प्रतीक्षा रहेगी आपके लिखे हुए की।
>उमर के शफ़्फ़ाक दरपनों में, पड़ी हैं जितनी दरार अब तक
>उन्ही की किरचें उठा उठा कर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं
बहुत अच्छा लिखा है । आप को और पढनें की इच्छा रहेगी ।
संजीत जी
परिचय तो मेरे शब्द हैं. देशकाल, की सीमाये अनुभूतियों पर अंकुश नहीं लगातीं
शुक्लाजी,नाहरजीम बासूतीजी और भार्गव जी,आपका धन्यवाद
समीर जी.
आपको धन्यवाद