Posted on April 30, 2007 by arunima
पहले जैसी बात नहीं हौ अब वीणा के तारों में
जयचंदों की भीड़ बढ़ी है गलियों में चौबारों में
आस्तीन के सांपों को तुम कब तक दूध पिलाओगे
फ़र्श खोदते हैं ये उसका, रहते जिन गलियारों में
एक शुआ से शीशे जैसे लम्हे भर क्या चमक गये
ख्वाबीदा हैं जर्रे बैठे सूरज चाँद सितारों में
सावन के अंधों की क्या है [...]
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Posted on April 26, 2007 by arunima
ख्वाब तोड कर पूछ रहे हैं कोई तो ताबीर बताये
भड़का कर शोले कहते हैं, कोई आ तासीर बताये
कल तक चम्बल के कछार की गुमनामी का वाशिन्दा था
आज यहां संसद के गलियारे अपनी जागीर बताये
ज़ख्म हुई जानों से हाकिम, हमदर्दी जतला कहता है
देंगे उसे सजायें , कोई कहाँ छुपी शमशीर बताये
रामराज्य था कभी यहाँ पर, कहते [...]
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Posted on April 23, 2007 by arunima
दर्द पिघलता रहा आँख से आंसू बन बन कर
हर्फ़ों में पिघला होता तो बनती एक गज़ल
छोड़ा नहीं आपने मेरे ख्वाबों का दामन
यादों का थामा होता तो बनती एक गज़ल
तन्हा होकर भी हम कितने तन्हा होते हैं?
सच में यदि होती तन्हाई, बनती एक गज़ल
आईने की आँखों में जो चेहरा दिखता है
उसको अगर जान पाते तो बनती [...]
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Posted on April 17, 2007 by arunima
यूँ झुकना हमें भी गवारा नहीं है
मगर हमने बोझा उतारा नहीं है
कदम लड़खड़ाये जरा इसलिये भी
कि बैसाखियों का सहारा नहीं है
नहीं तैरता कोई ताउम्र इसमें
ये दरिया है जिसका किनारा नहीं है
ये इक सुर्ख शै जिससे दामन बचाते
ये दिल है हमारा अँगारा नहीं है
अँधेरी सियाह रात में टिमटिमाता
दिया जल रहा है, सितारा नहीं है
कभी तुम बढ़ोगे [...]
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Posted on April 16, 2007 by arunima
जाग सके मेरे लफ़्ज़ों से वह अहसास कहीं तो होगा
तुमसे बातें करते करते यह आभास कहीं तो होगा
सिंहासन पर ताजपोशियों की खातिर बढ़ती भीड़ों में
जो पत्थर को भी जीने का दे विश्वास, कहीं तो होगा
साठ बरस वादों के टुकड़ों पर पल कर भी ख्वाबीदा है
जो इन्सान बना न अब तक ज़िन्दा लाश कहीं तो होगा
बरस [...]
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Posted on April 11, 2007 by arunima
जिन गज़लों के अशआरों से तुमने हमें नवाजा था
आज उन्ही को साथ लिये हम आये हैं इस महफ़िल में
राहेगुजर की तकलीफ़ों ने जितना हमें सुकून दिया
उतनी लज्जत मिली न हमको कदम चूमती मंज़िल में
लब पर खिलती हुई तबस्सुम,हँस हँस कर बतलाती है
तल्खी के कितने पैमाने छलके होंगे इस दिल में
कब सोचा था उस बूढ़े ने [...]
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Posted on April 9, 2007 by arunima
फिर से गली मोहल्लों में है लगता कुछ हथियार तने
नफ़रत को कुछ और हवा देनेवाले औज़ार बने
साम्प्रदायिकता के अलाव पर ताप रहे हैं हाथों को
अपना उल्लू सीधा करने की खातिर मुख्त्यार बने
कल तक टूटे फ़ालों वाले रहे भौंथरे चाकू जो
ज्यों ही लगा हाथ में मौका, नाम बदल तलवार बने
खबर इन्हें है साहिल बनना एक शहादत [...]
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Posted on April 8, 2007 by arunima
जाने क्यों आँखों में अक्सर एक नमी सी रहती है
एक नदी है जो बारिश के बिन भी बहती रहती है
जिस बस्ती की धुंधली यादें भी अब बाकी रही नहीं
वहाँ आस इक बूढ़ी अब भी रस्ता तकती रहती है
पहले नजरें मिली, और फिर लब ने लब से बातें की
दीवारे-अजनबियत जो है ढहते ढहते ढहती है
तुमसे ज्यादा निकट [...]
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Posted on April 5, 2007 by arunima
ज़ुल्फ़ों की जुम्बिशों से हुए कत्ल दस दफ़ा
इन बाँकुरों की आज शहादत तो देखिये
ज़िक्रे शमा से लब पे फ़फ़ोले पड़े हजार
वल्लाह नाजनीं की नजा़कत तो देखिये
पूछे है आफ़ताब से शब की वो दास्तां
अपने नुमाईंदे की हिमाकत तो देखिये
शिकवे खुदा से आप मुहब्बत के कीजिये
कैसी लिखी किताब में आयत तो देखिये
समझे न ढाई लफ़्ज़ का छोटा [...]
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Posted on April 4, 2007 by arunima
मेरा परिचय पूछने वाले, बस इतना है परिचय मेरादर्द भरी गज़लों की नगरी की मैं कोई शहजादी हूँ
अल्फ़ाज़ों ने गोद खिलाया, शब्दों ने लोरियां सुनाईसर पर साया बन कर मेरे, साथ रही मेरी परछाईंमुझे मदरसे ने किताब के किसी सफ़े से दूर रखा थाइसी लिये गीतों गज़लों की मैं अनगिन किताब पढ़ पाई
वैसे एक पहाड़ी [...]
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