आदत तो देखिये

ज़ुल्फ़ों की जुम्बिशों से हुए कत्ल दस दफ़ा

इन बाँकुरों की आज शहादत तो देखिये

ज़िक्रे शमा से लब पे फ़फ़ोले पड़े हजार

वल्लाह नाजनीं की नजा़कत तो देखिये

पूछे है आफ़ताब से शब की वो दास्तां

अपने नुमाईंदे की हिमाकत तो देखिये

शिकवे खुदा से आप मुहब्बत के कीजिये

कैसी लिखी किताब में आयत तो देखिये

समझे न ढाई लफ़्ज़ का छोटा सा इक सवाल

तालीम याफ़्ता ये जहालत तो देखिये

मेरी गज़ल पे कहता मुकर्रर पचास बार

कितनी हसीं है दोस्त की आदत तो देखिये

4 Responses to “आदत तो देखिये”

  1. nice poem.

  2. >शिकवे खुदा से आप मुहब्बत के कीजिये
    >कैसी लिखी किताब में आयत तो देखिये

    बहुत अच्छा लिखा है , बधाई ।

    मुंसिफ़ कटघरे में खड़े,मुजरिम करें सवाल
    बदले हुए ज़माने की रवायत तो देखिये

  3. मुंसिफ़ कटघरे में खड़े,मुजरिम करें सवाल
    बदले हुए ज़माने की रवायत तो देखिये

    अच्छी गज़ल है …

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