रस्ता तकती रहती है

जाने क्यों आँखों में अक्सर एक नमी सी रहती है

एक नदी है जो बारिश के बिन भी बहती रहती है

जिस बस्ती की धुंधली यादें भी अब बाकी रही नहीं

वहाँ आस इक बूढ़ी अब भी रस्ता तकती रहती है

पहले नजरें मिली, और फिर लब ने लब से बातें की

दीवारे-अजनबियत   जो   है   ढहते   ढहते   ढहती है

तुमसे ज्यादा निकट तुम्हारे, कोई और नहीं होगा

रोज शाम मेरी तन्हाई मुझसे आकर कहती है

आँधी- तूफ़ाँ, बारिश  ओले सब कुछ उसे गवारा है

वह चौराहे की प्रतिमा है, जाने क्या क्या सहती है

5 Responses to “रस्ता तकती रहती है”

  1. Good!

  2. अच्छा लिखा है आपने …..बधाई

  3. vaah vaah

  4. बहुत खूब, वाह वाह..हर पंक्ति सुंदर है, बधाई!!

  5. nice xpressions :)

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