तलवार बने
Posted on April 9, 2007 by arunima
फिर से गली मोहल्लों में है लगता कुछ हथियार तने
नफ़रत को कुछ और हवा देनेवाले औज़ार बने
साम्प्रदायिकता के अलाव पर ताप रहे हैं हाथों को
अपना उल्लू सीधा करने की खातिर मुख्त्यार बने
कल तक टूटे फ़ालों वाले रहे भौंथरे चाकू जो
ज्यों ही लगा हाथ में मौका, नाम बदल तलवार बने
खबर इन्हें है साहिल बनना एक शहादत होती है
इसीलिये तो नाव डुबोने वाली ये मंझधार बने
बार बार ये लगा मुखौटे, लिये कुदाली खोद रहे
ये न चाहते जमीं दोस्ती की आखिर हमवार बने
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बहुत सुन्दर!
घुघूती बासूती
अक्सर जिस बात को आप कहना चाहो वह किसी और की चिट्ठी में ज्यादा अच्छी तरह से लिखी मिल जाती है।
सही है!
बहुत सार-गम्भीर पंक्तियाँ.
उपयुक्त पुष्ट और सहज!!
बहुत अच्छे !
ठीक समय सही फर्माया आपने
बढिया !
“…अक्सर जिस बात को आप कहना चाहो वह किसी और की चिट्ठी में ज्यादा अच्छी तरह से लिखी मिल जाती है।…”
या फिर,
और, जिस बात को आप कह चुकते हैं, वह कोई और ज्यादा अच्छे और धारदार तरीके से कह देता है.
एकदम समीचीन रचना.
मेरे मन की बात है आप के शब्दों में… सुन्दर प्रस्तुति