तलवार बने

फिर से गली मोहल्लों में है लगता कुछ हथियार तने

नफ़रत को कुछ और हवा देनेवाले औज़ार बने

साम्प्रदायिकता के अलाव पर ताप रहे हैं हाथों को

अपना उल्लू सीधा करने की खातिर मुख्त्यार बने

कल तक टूटे फ़ालों वाले रहे भौंथरे चाकू जो

ज्यों ही लगा हाथ में मौका, नाम बदल तलवार बने

खबर इन्हें है साहिल बनना एक शहादत होती है

इसीलिये तो नाव डुबोने वाली ये मंझधार बने

बार बार ये लगा मुखौटे, लिये कुदाली खोद रहे

ये न चाहते जमीं दोस्ती की आखिर हमवार बने

10 Responses to “तलवार बने”

  1. बहुत सुन्दर!
    घुघूती बासूती

  2. अक्सर जिस बात को आप कहना चाहो वह किसी और की चिट्ठी में ज्यादा अच्छी तरह से लिखी मिल जाती है।

  3. सही है!

  4. बहुत सार-गम्भीर पंक्तियाँ.

  5. उपयुक्त पुष्ट और सहज!!

  6. बहुत अच्छे !

  7. ठीक समय सही फर्माया आपने

  8. बढिया !

  9. “…अक्सर जिस बात को आप कहना चाहो वह किसी और की चिट्ठी में ज्यादा अच्छी तरह से लिखी मिल जाती है।…”

    या फिर,
    और, जिस बात को आप कह चुकते हैं, वह कोई और ज्यादा अच्छे और धारदार तरीके से कह देता है.

    एकदम समीचीन रचना. :)

  10. मेरे मन की बात है आप के शब्दों में… सुन्दर प्रस्तुति

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