इस दरिया के साहिल में

जिन गज़लों के अशआरों से तुमने हमें नवाजा था

आज उन्ही को साथ लिये हम आये हैं इस महफ़िल में

राहेगुजर की तकलीफ़ों ने जितना हमें सुकून दिया

उतनी लज्जत मिली न हमको कदम चूमती मंज़िल में

लब पर खिलती हुई तबस्सुम,हँस हँस कर बतलाती है

तल्खी के कितने पैमाने छलके होंगे इस दिल में

कब सोचा था उस बूढ़े ने ऐसा भी दिन आयेगा

फ़र्क न होगा जिस दिन कोई, हुक्कामों में कातिल में

रुख हमने इसलिये सफ़ीने का मौजों के साथ किया

अब पहले सी बात नहीं है, इस दरिया के साहिल में

2 Responses to “इस दरिया के साहिल में”

  1. बहुत खूब. यह शेर अपना सा लगा

    लब पर खिलती हुई तबस्सुम,हँस हँस कर बतलाती है

    तल्खी के कितने पैमाने छलके होंगे इस दिल में

  2. बहुत बढ़िया.

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