झुकना हमें भी गवारा नहीं है
Posted on April 17, 2007 by arunima
यूँ झुकना हमें भी गवारा नहीं है
मगर हमने बोझा उतारा नहीं है
कदम लड़खड़ाये जरा इसलिये भी
कि बैसाखियों का सहारा नहीं है
नहीं तैरता कोई ताउम्र इसमें
ये दरिया है जिसका किनारा नहीं है
ये इक सुर्ख शै जिससे दामन बचाते
ये दिल है हमारा अँगारा नहीं है
अँधेरी सियाह रात में टिमटिमाता
दिया जल रहा है, सितारा नहीं है
कभी तुम बढ़ोगे हमारी भी जानिब
किया तुमने ऐसा इशारा नहीं है
अभी हमने हलकी सी आवाज़ दी है
कहाँ चल दिये तुम ? पुकारा नहीं है
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वाह वाह, बहुत खूब,,,क्या लिखती हैं आप!! बहुत सही.
बहुत सुन्दर गज़ल है ।
खास कर ये शेर :
>कदम लड़खड़ाये जरा इसलिये भी
>कि बैसाखियों का सहारा नहीं है
>अँधेरी सियाह रात में टिमटिमाता
>दिया जल रहा है, सितारा नहीं है
कदम लड़खड़ाये जरा इसलिये भी
कि बैसाखियों का सहारा नहीं है
बहुत अच्छी रचना….बधाई