झुकना हमें भी गवारा नहीं है

यूँ झुकना हमें भी गवारा नहीं है

मगर हमने बोझा उतारा नहीं है

कदम लड़खड़ाये जरा इसलिये भी

कि बैसाखियों का सहारा नहीं है

नहीं तैरता कोई ताउम्र इसमें

ये दरिया है जिसका किनारा नहीं है

ये इक सुर्ख शै जिससे दामन बचाते

ये दिल है हमारा अँगारा नहीं है

अँधेरी सियाह रात में टिमटिमाता

दिया जल रहा है, सितारा नहीं है

कभी तुम बढ़ोगे हमारी भी जानिब

किया तुमने ऐसा इशारा नहीं है

अभी हमने हलकी सी आवाज़ दी है

कहाँ चल दिये तुम ? पुकारा नहीं है

3 Responses to “झुकना हमें भी गवारा नहीं है”

  1. वाह वाह, बहुत खूब,,,क्या लिखती हैं आप!! बहुत सही.

  2. बहुत सुन्दर गज़ल है ।
    खास कर ये शेर :

    >कदम लड़खड़ाये जरा इसलिये भी
    >कि बैसाखियों का सहारा नहीं है

    >अँधेरी सियाह रात में टिमटिमाता
    >दिया जल रहा है, सितारा नहीं है

  3. कदम लड़खड़ाये जरा इसलिये भी

    कि बैसाखियों का सहारा नहीं है

    बहुत अच्छी रचना….बधाई

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