बनती एक गज़ल
Posted on April 23, 2007 by arunima
दर्द पिघलता रहा आँख से आंसू बन बन कर
हर्फ़ों में पिघला होता तो बनती एक गज़ल
छोड़ा नहीं आपने मेरे ख्वाबों का दामन
यादों का थामा होता तो बनती एक गज़ल
तन्हा होकर भी हम कितने तन्हा होते हैं?
सच में यदि होती तन्हाई, बनती एक गज़ल
आईने की आँखों में जो चेहरा दिखता है
उसको अगर जान पाते तो बनती एक गज़ल
जश्ने-ईद-दिवाली पर कुल शहर सजाया है
मायूसी को अगर सजाते, बनती एक गज़ल
बज़्म-ए-अदब में जो भी आया है, खामोश रहा
कहता अगर मुकर्रर कोई, बनती एक गज़ल
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सुन्दर !
घुघूती बासूती
बहुत खूब …बधाई
छुप छुप के गुनगुनाते रहे कुछ भी कहा नहीं
इक दिन हमे सुनाते तो बनती एक गज़ल
बहुत सुन्दर लिखा है आप… लिखते रहिये.. हम पढने के लिये आते रहेंगे
बहुत सुंदर. बधाई.