बनती एक गज़ल

दर्द पिघलता रहा आँख से आंसू बन बन कर

हर्फ़ों में पिघला होता तो बनती एक गज़ल

छोड़ा नहीं आपने मेरे ख्वाबों का दामन

यादों का थामा होता तो बनती एक गज़ल

तन्हा होकर भी हम कितने तन्हा होते हैं?

सच में यदि होती तन्हाई, बनती एक गज़ल

आईने की आँखों में जो चेहरा दिखता है

उसको अगर जान पाते तो बनती एक गज़ल

जश्ने-ईद-दिवाली पर कुल शहर सजाया है

मायूसी को अगर सजाते, बनती एक गज़ल

बज़्म-ए-अदब में जो भी आया है, खामोश रहा

कहता अगर मुकर्रर कोई, बनती एक गज़ल

5 Responses to “बनती एक गज़ल”

  1. सुन्दर !
    घुघूती बासूती

  2. बहुत खूब …बधाई

  3. छुप छुप के गुनगुनाते रहे कुछ भी कहा नहीं
    इक दिन हमे सुनाते तो बनती एक गज़ल

  4. बहुत सुन्दर लिखा है आप… लिखते रहिये.. हम पढने के लिये आते रहेंगे

  5. बहुत सुंदर. बधाई.

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