कोई तो तासीर बताये

ख्वाब तोड कर पूछ रहे हैं कोई तो ताबीर बताये

भड़का कर शोले कहते हैं, कोई आ तासीर बताये

कल तक चम्बल के कछार की गुमनामी का वाशिन्दा था

आज यहां संसद के गलियारे अपनी जागीर बताये

ज़ख्म हुई जानों से हाकिम, हमदर्दी जतला कहता है

देंगे उसे सजायें , कोई  कहाँ छुपी शमशीर बताये

रामराज्य था कभी यहाँ पर, कहते हैं वे, मानेंगे

एक बार आकर मारुत-सुत अपना सीना चीर दिखाये

कहने को मालिक है लेकिन हर दर पर दुत्कारी जाती

ये जिसको कहते हैं जनता ! किसको अपनी पीर बताये

One Response to “कोई तो तासीर बताये”

  1. हमेशा की तरह धारदार रचना !

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