शोले नहीं उगलती

पहले जैसी बात नहीं हौ अब वीणा के तारों में

जयचंदों की भीड़ बढ़ी है गलियों में चौबारों में

आस्तीन के सांपों को तुम कब तक दूध पिलाओगे

फ़र्श खोदते हैं ये उसका, रहते जिन गलियारों में

एक शुआ से शीशे जैसे लम्हे भर क्या चमक गये

ख्वाबीदा हैं जर्रे बैठे  सूरज चाँद सितारों में

सावन के अंधों की क्या है खता कोई बतलाये तो

फ़र्क नहीं दिखता जो उनको गुलमोहर-अंगारों  में

कितना सुकूँ रहा देने में, कैसे वह यह समझेगा

जिसने सारी उमर बिताई, होकर खड़े कतारों में

माँग वक्त की सुनकर शोले नहीं उगलती जो कलमें

फ़र्क नहीं होता उनमें और कुंद पड़े हथियारों में

2 Responses to “शोले नहीं उगलती”

  1. आस्तीन के सांपों को तुम कब तक दूध पिलाओगे

    फ़र्श खोदते हैं ये उसका, रहते जिन गलियारों में

    –बहुत खूब!!! बधाई.

  2. बहुत सुन्दर …

    विशेष कर ये पंक्तियां :

    माँग वक्त की सुनकर शोले नहीं उगलती जो कलमें
    फ़र्क नहीं होता उनमें और कुंद पड़े हथियारों में

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