अब न चाहत रात की

हम मरुस्थल की जमीं से , आन में दरके बहुत

बादलों से भीख पर मांगी नहीं बरसात की

आँज कर घनश्याम हमने नैन में अब रख लिये

अब न सुरमे की , न काजल की न चाहत रात की

ढूँढ़ते  बाज़ार में   पीतल      मुलम्मा     जो चढ़ा

जब गंवा दीं स्वर्ण की जो   चूड़ियां थी हाथ की

था सुना विषधर रहा करते हैं चंदन वॄक्ष पर

फिर कहानी यह गई दुहराई, संदल-गात की

ज़िन्दगी ने इस तरह खेली सदा चौसर यहाँ

शह कभी दी ही नही थी, किन्तु फिर भी मात की

2 Responses to “अब न चाहत रात की”

  1. हर बार की तरह बहुत खूब…अब तो आप अपनी किताब का नाम बता दें..खरीद लेते हैं, वही पढ़ेंगे..आराम से. :)

  2. अन्यथा न लिजियेगा मगर मैने देखा है कि आप दाद उठाती नहीं हैं, क्या बात है?

    दाद उठाने की प्रथा प्रचलन मे है और दाद लौटाने की भी…आप में दोनों का आभाव दिखा और हैरानी हुई…थोड़ा गौर करें. सभी दाद देने वाले दाद के आकांक्षी भी हैं और धन्यवाद की तो जरुर बनती है. एक तरफा सिलसिला बहुत लम्बा नहीं चलता…यह शुभाकांक्षी की सलाह है मात्र..अन्यथा न लें. :)

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