उठते हैं तूफ़ान बहुत

यौं तो हम पर पहले से ही थे उनके अहसान बहुत

और मोड़ने लगे इधर जो आते हैं तूफ़ान बहुत

वक्त मिलेगा अगर कभी तो उनको शाया कर देंगे

लिख कर रखे हुए हैं हमने गज़लों के दीवान बहुत

दोमाले पर जाकर जबसे बैठे, तब से बदल गये

कल तक जिन का दावा सबसे है उनकी पहचान बहुत

साया-ए-लश्कर में चलते चलते काफ़ी   निकले हैं

सीने की गहराई में पर, अब भी हैं अरमान बहुत

एक हवा के चंचल झोंके से उसकी जड़ उखड़ गई

ऊंचे होने का पीपल को कल तक रहा गुमान बहुत

राधा आकर कोई नाचे जमनाजी की रेती पर

ऐसा हुआ नहीं, हम छेड़े बाँसुरिया की तान बहुत

दर पर हमने दीं आवाज़ें लेकिन तुमने सुनी नहीं

बीच हमारे पसरा बैठा, एक बड़ा दालान बहुत

दिल के भावों कोई भी दिल मिला न राहों गलियों में

लगी हुईं हैं चौराहों पर यों दिल की दूकान बहुत

5 Responses to “उठते हैं तूफ़ान बहुत”

  1. सुन्दर रचना है।

    दिल के भावों कोई भी दिल मिला न राहों गलियों में

    लगी हुईं हैं चौराहों पर यों दिल की दूकान बहुत

  2. वाह वाह, हमें तो लगा कि आपने हमारी पिछली टिप्पणी का बुरा लगाकर लिखना ही छोड़ दिया. आत्म ग्लानी में डूबे बैठे थे. आज फिर से लिखता देखकर उबर पाये हैं, बहुत आभार.

    लिखते रहें इसी तरह बेहतरीन!! :)

  3. वाह अरूणिमा जी बहुत खूब बेहतरीन रचना है,…

    एक हवा के चंचल झोंके से उसकी जड़ उखड़ गई

    ऊंचे होने का पीपल को कल तक रहा गुमान बहुत
    हर एक पंक्ति भाव-पूर्ण है,जैसे कि..

    दिल के भावों कोई भी दिल मिला न राहों गलियों में

    लगी हुईं हैं चौराहों पर यों दिल की दूकान बहुत
    बहुत सुंदर!
    बहुत-बहुत बधाई!

    सुनीता(शानू)

  4. सुनीताजी, समीरजी और परमजीतजी

    धन्यवाद

  5. What to say…. Its amazinag…really!!!
    भावनाएं बहुत सुंदर हैं जिसे शब्द नहीं दिया जा सकता…।

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