होता ज़िक्र हमारा ही
Posted on May 29, 2007 by arunima
सूरज चाँद सितारे उनके गुलदानों में कैद हुए
साथ हमारा रहा निभाता, एक सिरफ़ अंधियारा ही
शहदीले सपने चाहे जितने भी भर लो आँखों में
टपकेगा उनसे जो ,होगा केवल आँसू खारा ही
चाहे देखो नफ़रत से या उसे हिकारत से देखो
अल्ला का बन्दा रहता है उसको हरदम प्यारा ही
बुझी राख को उलटो पलटो, खूब हवायें दे देखो
भड़काता है आग परन्तु, सुलग रहा अंगारा ही
ढपली चाहे अलग अलग हों और राग अपने अपने
सबको रहा जोड़ता फिर भी केवल भाईचारा ही
ये गिटार, मेंडोलिन, बेन्जो,दो पल ही बहलाते हैं
दिल में गहरे असर करे है मीरा का इकतारा ही
महफ़िल में हैं और सुखनवर, सुना रहे नज़्में कविता
बात गज़ल की जब जब होती,होता ज़िक्र हमारा ही
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चाहे देखो नफ़रत से या उसे हिकारत से देखो
अल्ला का बन्दा रहता है उसको हरदम प्यारा ही
–मंच लूट लिया आपने तो…वाह!!!
“ये गिटार, मेंडोलिन, बेन्जो,दो पल ही बहलाते हैं
दिल में गहरे असर करे है मीरा का इकतारा ही”
वाह वाह कितना सुन्दर लिखा है आपने। मन गदगद हो गया।
अच्छी रचना.
सूरज चँद सितारे उनके गुलदानों में कैद हुए
साथ हमारा रहा निभाता, एक सिरफ़ अंधियारा ही………..
बहुत खूब…….
अच्छी रचना है।
बहुत सुंदर रचना हैं…