Posted on June 21, 2007 by arunima
वो कहते थे चौपालों पर आज नये अफ़साने हैं
सुना, नाम बदले हैं लेकिन किस्से वही पुराने हैं
अंधों की सत्ता में मिलती रहीं रेवड़ी उनको ही
जो खुद अंधे हैं या जिनके अंधों से याराने हैं
बन कर आज मुकादम, अपने लिये कसीदे पढ़वाते
सभी जानते हैं कि पैंतरे ये उनके बचकाने हैं
पगडंडी पर बिछी हुईं हैं नजरें अपनी [...]
Filed under: Uncategorized | 2 Comments »
Posted on June 13, 2007 by arunima
उजड़े हुए खेत ही केवल बाकी अब इस गांव में
पगडंडी पर कांटे बिखरे, छाले अनगिन पांव में
सूरज ने मौसम से मिल कर कैसे हैं षड़यंत्र रचे
आग बरसती रहती है बूढ़े बरगद की छांव में
जाने कैसे करवट लेकर वक्त पड़ा है बिस्तर पर
सरगम के सारे स्वर बन्दी, कर्कश कांव कांव में
एक नाम की खातिर वो भी [...]
Filed under: Uncategorized | 4 Comments »