क्या है बाकी नाम में

उजड़े हुए खेत ही केवल बाकी अब इस गांव में

पगडंडी पर कांटे बिखरे, छाले अनगिन पांव में

सूरज ने मौसम से मिल कर कैसे हैं षड़यंत्र रचे

आग बरसती रहती है बूढ़े बरगद की छांव में

जाने कैसे करवट लेकर वक्त पड़ा है बिस्तर पर

सरगम के सारे स्वर बन्दी, कर्कश कांव कांव में

एक नाम की खातिर वो भी दीवाने बन कर घूमे

कल तक जिनका खना था कुछ अर्थ नहीं है नाम में

बहुत दिनों से कलम न जागी ओढ़ उदासी जो लेटी

मिसरा कोई याद न आया इस तन्हाई शाम में

साकी ने बेचा मयखाना, शोख नजर नीलाम हुइ

लज्जत पहले सी न बाकी रही आजकल जाम में

4 Responses to “क्या है बाकी नाम में”

  1. बहुत दिनों से कलम न जागी ओढ़ उदासी जो लेटी
    मिसरा कोई याद न आया इस तन्हाई शाम में

    –बहुत खूब अरुणिमा जी!! आजकल कुछ कम लिखा जा रहा है, क्या बात है?

  2. समीरजी,

    मैने पहले ही लिख दिया ( जानती थी कि आपकी शिकायत आयेगी )

    बहुत दिनों से कलम न जागी, ओढ़ उदासी जो लेटी

  3. बस अब सोने मत देना मेरी तो यही इच्छा है
    गुनगुनाने वली कविता,याद रह जाने वाली कविता,जो होठो पर चड जाये वो कविता है ये

  4. क्या बात कही सहजता से मन की बात भी बता दी और बहुत कुछ कह भी दिया …
    बहुत सुंदर!!!

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