सब चेहरे अनजाने हैं
Posted on June 21, 2007 by arunima
वो कहते थे चौपालों पर आज नये अफ़साने हैं
सुना, नाम बदले हैं लेकिन किस्से वही पुराने हैं
अंधों की सत्ता में मिलती रहीं रेवड़ी उनको ही
जो खुद अंधे हैं या जिनके अंधों से याराने हैं
बन कर आज मुकादम, अपने लिये कसीदे पढ़वाते
सभी जानते हैं कि पैंतरे ये उनके बचकाने हैं
पगडंडी पर बिछी हुईं हैं नजरें अपनी बरसों से
लेकिन शै वो नजर न आती, हम जिसके दीवाने हैं
पाता है दीदार ईश का कोई अपनी चौखट पर
और किसी को रहे छलावा देते ये बुतखाने हैं
फिर से अबकी बार दूर से सभी बहारें गुजर गईं
किसे पता है मौसम क्या क्या अपने मन में ठाने है
चलो अरुणिमा इस नगरी में कोई अपना रहा नहीं
इस नगरी के आईनों में सब चेहरे अनजाने हैं
Filed under: Uncategorized
चलो अरुणिमा इस नगरी में कोई अपना रहा नहीं
इस नगरी के आईनों में सब चेहरे अनजाने हैं
—बहुत खूब, अरुणिमा जी. हमेशा की तरह बेहतरीन!!
जबरदस्त ! बेहद पसंद आई ये कृति ।