कुछ टूटा था

लम्हे भर में एक दहाई का रिश्ता झट से टूटा था
मैं हैरां थी रही सोचती वो  मुझसे क्योंकर रूठा था
मेरे घर की छत पर से जो बिन बरसे फिर से गुजरा है
उस बादल की  खता नहीं है, मेरा ही न्यौता झूठा था
जो हासिल को अपनी कुव्वत का रह रह दे नाम रहे
उनको खबर नहीं बिल्ली के [...]

अश्क आंखों के रीत जाते हैं

यों ही हम जहमतें उठाते हैं
चन्द अशआर गुनगुनाते हैं
वे बताते हैं राह दुनिया को
अपनी गलियों को भूल जाते हैं
लेते परवाज़ नहीं अब ताईर
सिर्फ़ पर अपने फ़ड़फ़ड़ाते हैं
पांव अपने ही उठ नहीं पाते
वे हमें हर लम्हे बुलाते हैं
आप कहते हैं- क्या कलाम लिखा ?
और हम हैं कि मुस्कुराते हैं
जिनको दरिया डुबो नहीं पाया
एक चुल्लू में डूब [...]

हम भी गज़ल लिखे

ज़माने भर का चलन है ऐसा खराब, हम भी गज़ल लिखें हैं
जिसे भी देखो वही कहे है जनाब, हम भी गज़ल लिखे हैं
न लालो-गुल है न मीनो-सागर,न है तबस्सुम जरा लबों पर
न जाने कोई, कहां पे छलकी शराब, हम भी गज़ल लिखे हैं
उठी हैं नजरें जिधर से गुजरे,है बात दीगर कोई न बोले
मगर छुपाये कहां [...]

ये बरसात

आलिंगन में सुलगे तन की यादों वाली ये बरसात
भीगे कपड़े,  सुलगे तन को देती गाली ये बरसात
अमराई में खनकाती सी चूड़ी चढ़ती पींगों में
टपक रही छत से भरती है बर्तन खाली ये बरसात
चाँद रात से महकाती सी कुछ सपने कुछ आंखों में
लाती है पहाड़ सी लम्बी, रातें काली ये बरसात
खिड़की पर बादल का टुकड़ा संदेशे [...]