Posted on August 17, 2007 by arunima
लम्हे भर में एक दहाई का रिश्ता झट से टूटा था
मैं हैरां थी रही सोचती वो मुझसे क्योंकर रूठा था
मेरे घर की छत पर से जो बिन बरसे फिर से गुजरा है
उस बादल की खता नहीं है, मेरा ही न्यौता झूठा था
जो हासिल को अपनी कुव्वत का रह रह दे नाम रहे
उनको खबर नहीं बिल्ली के [...]
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Posted on August 10, 2007 by arunima
यों ही हम जहमतें उठाते हैं
चन्द अशआर गुनगुनाते हैं
वे बताते हैं राह दुनिया को
अपनी गलियों को भूल जाते हैं
लेते परवाज़ नहीं अब ताईर
सिर्फ़ पर अपने फ़ड़फ़ड़ाते हैं
पांव अपने ही उठ नहीं पाते
वे हमें हर लम्हे बुलाते हैं
आप कहते हैं- क्या कलाम लिखा ?
और हम हैं कि मुस्कुराते हैं
जिनको दरिया डुबो नहीं पाया
एक चुल्लू में डूब [...]
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Posted on August 7, 2007 by arunima
ज़माने भर का चलन है ऐसा खराब, हम भी गज़ल लिखें हैं
जिसे भी देखो वही कहे है जनाब, हम भी गज़ल लिखे हैं
न लालो-गुल है न मीनो-सागर,न है तबस्सुम जरा लबों पर
न जाने कोई, कहां पे छलकी शराब, हम भी गज़ल लिखे हैं
उठी हैं नजरें जिधर से गुजरे,है बात दीगर कोई न बोले
मगर छुपाये कहां [...]
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Posted on August 2, 2007 by arunima
आलिंगन में सुलगे तन की यादों वाली ये बरसात
भीगे कपड़े, सुलगे तन को देती गाली ये बरसात
अमराई में खनकाती सी चूड़ी चढ़ती पींगों में
टपक रही छत से भरती है बर्तन खाली ये बरसात
चाँद रात से महकाती सी कुछ सपने कुछ आंखों में
लाती है पहाड़ सी लम्बी, रातें काली ये बरसात
खिड़की पर बादल का टुकड़ा संदेशे [...]
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