ये बरसात

आलिंगन में सुलगे तन की यादों वाली ये बरसात

भीगे कपड़े,  सुलगे तन को देती गाली ये बरसात

अमराई में खनकाती सी चूड़ी चढ़ती पींगों में

टपक रही छत से भरती है बर्तन खाली ये बरसात

चाँद रात से महकाती सी कुछ सपने कुछ आंखों में

लाती है पहाड़ सी लम्बी, रातें काली ये बरसात

खिड़की पर बादल का टुकड़ा संदेशे ले भेज रही

ठंडे चूल्हे, उमड़ी बाढ़ें, नजर सवाली ये बरसात

उफ़ ये मस्त बनाती मन को ठंडी ठंडी बौछारें

जाने कितनी बार और खेलेगी पाली ये बरसात

6 Responses to “ये बरसात”

  1. बहुत अच्छी लगी.

  2. अमराई में खनकाती सी चूड़ी चढ़ती पींगों में
    टपक रही छत से भरती है बर्तन खाली ये बरसात.

    –वाह वाह!!!हमेशा की तरह बहुत खूब, अरुणिमा जी.

  3. आलिंगन में सुलगे तन की यादों वाली ये बरसात….

    …..भीगी-भीगी, महकी-महकी,सांसों वाली वो बरसात…
    डूब गया है तन मन मोरा, करके याद प्रिय की बात…

  4. बहुत खूबसूरत रचना है ।
    एक शेर की आहुति मेरी तरफ़ से :
    >मन में नई उमंगे ले कर फ़िर से कोई टीस उठी
    >ख्वाबों से अठखेली करती भोली भाली ये बरसात

    अनूप

  5. अरुणिमाजी
    बरसात का जादू आप पर हावी है जरा उनका भी सोचिये-

    एक चिंगारी सभी के हाथ मे हैं
    हर कोई इस झोपड़ी की घात में हैं.

    ओढ़नी हो एक जिसकी पूछ उससे
    भीगने का दर्द जो बरसात में हैं. (ज्ञान प्रकाश विवेक)

    रही हमारी बात अब हम प्रेत बन चुके हैं- पर तमन्नाओं का क्या करें.

    बादल ये मुहब्वत के कहीं और बरसते हैं.
    इक बूँद की खातिर हम बरसों से तरसते हैं.

    आप छन्द में कहीं कहीं जल्दबाजी कर रहीं हैं
    खैर मतले वाली ग़ज़ल लिखना आप को आ ही गया.

    अल्लाह करे ज़ोरे कलम और ज़्यादा.
    डॉ.सुभाष भदौरिया.

  6. अमराई में खनकाती सी चूड़ी चढ़ती पींगों में
    टपक रही छत से भरती है बर्तन खाली ये बरसात

    मन को भा गई ये पंक्तियाँ !

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