हम भी गज़ल लिखे

ज़माने भर का चलन है ऐसा खराब, हम भी गज़ल लिखें हैं

जिसे भी देखो वही कहे है जनाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

न लालो-गुल है न मीनो-सागर,न है तबस्सुम जरा लबों पर

न जाने कोई, कहां पे छलकी शराब, हम भी गज़ल लिखे हैं

उठी हैं नजरें जिधर से गुजरे,है बात दीगर कोई न बोले

मगर छुपाये कहां हुपे है शबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

हमें खबर है हमें न आता सुखनवरी का ये फ़न तुम्हारा

यहां किसी ने दिया न हम पर दबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

तुम्हारी उम्मीद से अधिक हो किया है इज़हार जो ये हमने

तुम्हारी नजरों में ये बनेगा अजाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

तुम्हारी महफ़िल में कोई परदा नहीं गवारा है शायरी में

इसीलिये तो उठाई हमने नकाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

जिन्हें ये दावा गज़लसरा हैं, न उनके जैसा लिखे है कोई

बने हैं हड्डी, जहां बना है कबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

हमारी लफ़्ज़ों को अपना कह के सुना रहे हैं जो बज़्म में वे

उन्हीं की खातिर किया है हमने सबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

2 Responses to “हम भी गज़ल लिखे”

  1. खूब लिखिय कौन मना कर रहा है. जब इतना अच्छा लिखती हैं तो बैगेर फिकर लिखती रहें. :)

  2. वाह वाह. आज तुमने इतनी प्यारी बहर इस्तेमाल की उर्दू हिन्दी, गुजराती तीन भाषा की ग़ज़लों में बहुत कम प्रयुक्त हुई है. कथ्य शिल्प दोनों में कमाल किया है. ग़ौर फ़र्मायें-

    अजी कहें क्या जमाने भर की, ग़ज़ल तुम्हारी जु भा गई है.
    अमीर ख़ुसरो कि याद आयी, हमारे दिल को लुभा गई है.

    सभी को बांटे, हमीं को चांटे, इसी अदा ने है मार डाला,
    कबाब सब को, खिलाये उसने, हम्हीं को नश्तर चुभा गई है.

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