अश्क आंखों के रीत जाते हैं

यों ही हम जहमतें उठाते हैं
चन्द अशआर गुनगुनाते हैं
वे बताते हैं राह दुनिया को
अपनी गलियों को भूल जाते हैं
लेते परवाज़ नहीं अब ताईर
सिर्फ़ पर अपने फ़ड़फ़ड़ाते हैं
पांव अपने ही उठ नहीं पाते
वे हमें हर लम्हे बुलाते हैं
आप कहते हैं- क्या कलाम लिखा ?
और हम हैं कि मुस्कुराते हैं
जिनको दरिया डुबो नहीं पाया
एक चुल्लू में डूब [...]