अश्क आंखों के रीत जाते हैं

यों ही हम जहमतें उठाते हैं

चन्द अशआर गुनगुनाते हैं

वे बताते हैं राह दुनिया को

अपनी गलियों को भूल जाते हैं

लेते परवाज़ नहीं अब ताईर

सिर्फ़ पर अपने फ़ड़फ़ड़ाते हैं

पांव अपने ही उठ नहीं पाते

वे हमें हर लम्हे बुलाते हैं

आप कहते हैं- क्या कलाम लिखा ?

और हम हैं कि मुस्कुराते हैं

जिनको दरिया डुबो नहीं पाया

एक चुल्लू में डूब जाते हैं

उसके होठों की मय कभी पी थी

उम्र गुजरी है, लड़खड़ाते हैं

एक तस्वीर का सहारा ले

अपनी तन्हाईयां बिताते हैं

दर्द सीने में जब भी उठता है

ढाल लफ़्ज़ों में हम सुनाते हैं

अरुणिमा

3 Responses to “अश्क आंखों के रीत जाते हैं”

  1. बेहतरीन, अरुणिमा जी. आज कुछ अलग से तेवर??

  2. डा.रमा द्विवेदी

    सुन्दर अभिव्यक्ति, अरुणिमा जी ….बधाई…

  3. अब लोग भला कुछ भी कहें
    आप अच्छी गज़ल सुनाते हैं ।

Leave a Reply