अश्क आंखों के रीत जाते हैं
Posted on August 10, 2007 by arunima
यों ही हम जहमतें उठाते हैं
चन्द अशआर गुनगुनाते हैं
वे बताते हैं राह दुनिया को
अपनी गलियों को भूल जाते हैं
लेते परवाज़ नहीं अब ताईर
सिर्फ़ पर अपने फ़ड़फ़ड़ाते हैं
पांव अपने ही उठ नहीं पाते
वे हमें हर लम्हे बुलाते हैं
आप कहते हैं- क्या कलाम लिखा ?
और हम हैं कि मुस्कुराते हैं
जिनको दरिया डुबो नहीं पाया
एक चुल्लू में डूब जाते हैं
उसके होठों की मय कभी पी थी
उम्र गुजरी है, लड़खड़ाते हैं
एक तस्वीर का सहारा ले
अपनी तन्हाईयां बिताते हैं
दर्द सीने में जब भी उठता है
ढाल लफ़्ज़ों में हम सुनाते हैं
अरुणिमा
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बेहतरीन, अरुणिमा जी. आज कुछ अलग से तेवर??
डा.रमा द्विवेदी
सुन्दर अभिव्यक्ति, अरुणिमा जी ….बधाई…
अब लोग भला कुछ भी कहें
आप अच्छी गज़ल सुनाते हैं ।