कुछ टूटा था
Posted on August 17, 2007 by arunima
लम्हे भर में एक दहाई का रिश्ता झट से टूटा था
मैं हैरां थी रही सोचती वो मुझसे क्योंकर रूठा था
मेरे घर की छत पर से जो बिन बरसे फिर से गुजरा है
उस बादल की खता नहीं है, मेरा ही न्यौता झूठा था
जो हासिल को अपनी कुव्वत का रह रह दे नाम रहे
उनको खबर नहीं बिल्ली के भागों से छींका टूटा था
कितनी भोली है, पागल है सब जिसको कहते हैं जनता
फिर से उसका पांव पूजती कई बरस जिसने लूटा था
थी नादान अरुणिमा कल भी, ऐर आज भी बदल न पाई
वो अब तक वट समझी जिसको छुईमुई वाला बूटा था
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कितनी भोली है, पागल है सब जिसको कहते हैं जनता
फिर से उसका पांव पूजती कई बरस जिसने लूटा था
–बहुत खूब!!
बहुत अच्छी है.