कुछ टूटा था

लम्हे भर में एक दहाई का रिश्ता झट से टूटा था

मैं हैरां थी रही सोचती वो  मुझसे क्योंकर रूठा था

मेरे घर की छत पर से जो बिन बरसे फिर से गुजरा है

उस बादल की  खता नहीं है, मेरा ही न्यौता झूठा था

जो हासिल को अपनी कुव्वत का रह रह दे नाम रहे

उनको खबर नहीं बिल्ली के भागों से छींका टूटा था

कितनी भोली है, पागल है सब जिसको कहते हैं जनता

फिर से उसका पांव पूजती कई बरस जिसने लूटा था

थी नादान अरुणिमा कल भी, ऐर आज भी  बदल न पाई

वो अब तक वट समझी जिसको छुईमुई वाला बूटा था

2 Responses to “कुछ टूटा था”

  1. कितनी भोली है, पागल है सब जिसको कहते हैं जनता
    फिर से उसका पांव पूजती कई बरस जिसने लूटा था

    –बहुत खूब!!

  2. बहुत अच्छी है.

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