सोता रह गया

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जो न होना था यहां, बस वो ही होता रह गया

मुस्कुराना था जिसे, वो सिर्फ़ रोता रह गया

काफ़िले दहलीज तक आये व आगे बढ़ गये

और वो गफ़लत का मारा सिर्फ़ सोता रह गया

अब्र बरसे ख्वाब के हर रात ही दालान में

एक वो था, नींद के बस बीज बोता रह गया

शेख ने तस्वीह जो दी, टूट कर वो गिर गई

प्रार्थना में वो महज मनके पिरोता रह गया

दाग सीने पर लगा, इस बात को जाना नहीं

रात दिन अपनी कबा को सिर्फ़, धोता रह गया

मर गई है आखिरी उम्मीद भी इस दौड़ में

उड़ न पाया हाथ में जो एक तोता रह गया

शायरी की दाद देगी वज़्म ये, यह सोचकर

नज़्म में अल्फ़ाज़ इक शायर समोता रह गया

6 Responses to “सोता रह गया”

  1. शेर उसने जो लिखे, दिल को थामें हाथ में
    काम सारे छोड़ कर, मैं तो पढ़ता रह गया.

    –तस्वीर भी बड़ी उम्दा लगाई है इस दफा. बहुत खूब. :)

  2. बहुत बढिया शेर हैं।पूरी गजल बहुत खूबसूरती से पिरोई हैं।

    –तस्वीर भी बड़ी उम्दा लगाई है इस दफा. बहुत खूब. :)

  3. काफी प्रवाहमय तरीके से लिखते हैं आप — शास्त्री जे सी फिलिप

    मेरा स्वप्न: सन 2010 तक 50,000 हिन्दी चिट्ठाकार एवं,
    2020 में 50 लाख, एवं 2025 मे एक करोड हिन्दी चिट्ठाकार!!

  4. बहुत अच्छी रचना है. मैं शोकिया एक पत्रिका परकाशित करता हूं यदि आप इजाजत दें तो उसमे इसे प्रकाशित कर सकता हूं
    pls reply
    yogesh.samdarshi@gmail.com

  5. शायरी की दाद देगी वज़्म ये, यह सोचकर

    नज़्म में अल्फ़ाज़ इक शायर समोता रह गया

    बहुत खूबसूरत गज़ल.

  6. अब्र बरसे ख्वाब के हर रात ही दालान में
    एक वो था, नींद के बस बीज बोता रह गया

    दर्द से दर्द के लिए, बढ़िया!

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