अत्तार की गली से

वो एक झोंका लगा था आया यहां पे अत्तार की गली से

जो पूछा, बोला लगा के दस्तक तुम्हारे दर पर इधर बढ़ा है

तुम्हें ये शायद खबर नहीं है, मगर बताती है ये शाहकारी

बड़ी ही फ़ुरसत से ये मुजस्सिम,खुदा के हाथों गया गढ़ा है

न आई होली, न महकी सरसों न फूले टेसू, न संवरी बौरें

मगर फ़िज़ां पे अजीब सा ये खुमार फिर भी लगा चढ़ा है

ये गेसुओं से गिरा है गौहर, या दीद-ए-तर का कोई मोती

जो खिल रहा है कँवल के लब पर, कहां से कोई कहो झड़ा है

न फूल खिलते, न भंवरे गूंजें, न उड़ती तितली, न चहके चिड़िया

न जाने कब से खिज़ां को ओढ़े, ये एक गुलशन यहां खड़ा है

One Response to “अत्तार की गली से”

  1. श्रेष्ठ कृति!!!

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