नायाब हैं हम
Posted on October 17, 2007 by arunima
कहने को कोई बात नहीं, पर बात है कुछ बेताब हैं हम
अपना ही पता मिल न पाया क्या बात है क्यों नायाब हैं हम
पलकों के दरीचे में बैठे, बस राह निहारा करते हैं
पैबस्त न होते आंखों में, कुछ ऐसे टूटे ख्वाब हैं हम
सर से छत उड़ी सहारे की दीवारें भी सब ध्वस्त हुईं
पर हिले न अपनी जड़ से जो दालानों के महराब हैं हम
है एक दायरा जीने का जिससे हम निकले नहीं कभी
है और किसी से काम नहीं, मावस्या के महताब हैं हम
सहरा की धूलों में लिपटे हैं सभी आबले पांवों के
राहें तबील सूखे लब हैं चलते रहते बेआब हैं हम
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मैं केरल से, मलयालम में ब्लोग कर रहा हूँ।
मेरे ब्लोग में हिन्दी की प्रविष्टियाँ भी शामिल है।
http://rajichandrasekhar.wordpress.com
बहुत बहुत खूब्…।
पलकों के दरीचे में बैठे, बस राह निहारा करते हैं
पैबस्त न होते आंखों में, कुछ ऐसे टूटे ख्वाब हैं हम
सहरा की धूलों में लिपटे हैं सभी आबले पांवों के
राहें तबील सूखे लब हैं चलते रहते बेआब हैं हम
अच्छा है. पहली बार में भा गया. बधाई हो बहुत अच्छा लिखा है .
“जो बात अक्सर रही अनकही, वह कहने का प्रयास”
इस ने और भी ज़्यादा मुतास्सिर किया.
मीत
बहुत खूबी से प्रतीक लिये हैं
वाकई-आपकी रचनायें को देखकर यह आप कह सकती हैं-नायाब हैं हम!!
बहुत खूब कहा!!