पत्थर बहुत सारे
Posted on February 5, 2008 by arunima
उड़ रहे हैं अब हवा में पर बहुत सारे
झुक रहे हैं पांव में अब सर बहुत सारे
क्या वज़ह थी कोई भी ये जान न पाया
बस्तियों में जल रहे हैं घर बहुत सारे
एक दो हों तो मुनासिब, सामना कर लें
ज़िन्दगी के सामने हैं डर बहुत सारे
हो नहीं पाया नफ़े का कोई भी सौदा
एक तनख्वाह और उस पर कर बहुत सारे
एक आंधी, एक तूफ़ां, एक है बारिश
इक दिलासा, हैं यहां छप्पर बहुत सारे
इल्तिजायें सब अधूरी ही रहीं आखिर
एक मज़नूं और हैं पत्थर बहुत सारे
चल रहे हैं राह में रंगीन ले हसरत
चुभ रहे हैं पांव में कंकर बहुत सारे
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ek tankha(vetan) aur kar bahut sare,bahut bahut badhiya,badhai.
हो नहीं पाया नफ़े का कोई भी सौदा
एक तनख्वाह और उस पर कर बहुत सारे
–बहुत बेहतरीन!!
well expressed feelings of less priveleged……good really good
बहुत सुन्दर ! पूरी की पूरी रचना बहुत बढ़िया लगी ।
घुघूती बासूती
बहुत अच्छी ग़ज़ल. बधाई आप को.
jeevan ka jeevant udaaharaN hai…