दिल की तड़पन, कसक सभी कुछ अब आंसू से धो दी जाये
फिर होठों पर मुस्कानों की फ़सल सुनहरी बो दी जाए
है तुमको उम्मीद अगर तो वो नहरें भी खोद सकेगा
पहले उसके हाथों में ला एक कुदाली तो दी जाये
सब कुछ लुटा बची है केवल रिश्तों की झीनी सी गठरी
अच्छा होगा ये गठरी भी अब राहों में खो दी जाये
हीरे हों सिक्के हों चाहे हो पत्थर का कोई टुकड़ा
कहलाती है भीख सदा जो बढ़ी आंजुरि को दी जाये
लिखते लिखते थकी कलम का केवल ये अरमान बचा है
शायद इक दिन कोई तवज़्ज़ो, उसकी गज़लों को दी जाये
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दिल की तड़पन, कसक सभी कुछ अब आंसू से धो दी जाये
फिर होठों पर मुस्कानों की फ़सल सुनहरी बो दी जाए
–क्या बात है!! बहुत दिनों बाद दिख रही हो..सब बढ़िया तो है?
बहुत उम्दा रचना.
लिखते लिखते थकी कलम का केवल ये अरमान बचा है
शायद इक दिन कोई तवज़्ज़ो, उसकी गज़लों को दी जाये
क्या बात है ! बहुत अच्छा !
सब कुछ लुटा बची है केवल रिश्तों की झीनी सी गठरी
अच्छा होगा ये गठरी भी अब राहों में खो दी जाये
लिखते लिखते थकी कलम का केवल ये अरमान बचा है
शायद इक दिन कोई तवज़्ज़ो, उसकी गज़लों को दी जाये
आप ने कमाल का लिखा है…इसी तरह लिखते रहिये तवज़्ज़ो की बात छोडिये, लोग आप को सर आंखों पर बिठा लेंगे….बेहतरीन ग़ज़ल…एक दम अलग और खूबसूरत अंदाज़ में लिखी हुई…बधाई
नीरज