Posted on April 9, 2008 by arunima
तुमने जो कुछ समझा, हमने वैसा तो कुछ कहा नहीं था
क्योंकि अपरिचय का जो पुल था बीच हमारे ढहा नहीं था
कैसे हम उनके अश्कों की कथा ज़माने को बतलाते
जो कुछ उन पर बीता, हमने वैसा कुछ भी सहा नहीं था
जाने कैसे डूब गये वो, न तो खबर बाढ़ की आई
बाँध तोड़ कर रेला भी कोई बस्ती [...]
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Posted on April 1, 2008 by arunima
हम गज़ल की गुनगुनी गरमाहटोम में जब नहाये
मीत तेरे चित्र उस पल पास आकर मुस्कुराये
झूमती पगडंडियों ने जब कदम चूमे हमारे
यों लगा पग के अलक्तक सामने आ मुस्कुराये
पत्तियों के जब झरोखों से हवा ने झांक देखा
घुंघरुओं की नींद टूटी, कसमसाये झनझनाये
ख्वाब में रिश्ते हजारों दीप बन कर जल रहे थे
साजिशों की रोशनी में रह गये [...]
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Posted on February 5, 2008 by arunima
उड़ रहे हैं अब हवा में पर बहुत सारे
झुक रहे हैं पांव में अब सर बहुत सारे
क्या वज़ह थी कोई भी ये जान न पाया
बस्तियों में जल रहे हैं घर बहुत सारे
एक दो हों तो मुनासिब, सामना कर लें
ज़िन्दगी के सामने हैं डर बहुत सारे
हो नहीं पाया नफ़े का कोई भी सौदा
एक तनख्वाह और उस [...]
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Posted on January 23, 2008 by arunima
नाम ढूँढ़ते हैं इक ऐसा, जैसा कोई नाम नहीं हो
सूरज निकले दोपहरी हो, लेकिन उसकी शाम नहीं हो
हमसे सबको उम्मीदें हैं, जुदा नहीं हो तुम भी इससे
हम तो बन जायेंगे लक्षमण, लेकिन तुम ही राम नहीं हो
किस्सागोई की आदत तो साथ रही अपने सदियों से
लेकिन फिर भी ये चाहा है सारे किस्से आम नहीं हो
ज़ुल्फ़ों [...]
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Posted on December 27, 2007 by arunima
वो लिख देते रोज और हम कभी कभी ही लिख पाते हैं
वो कहते हर बात, हमें क्या कहना सोच नहीं पाते हैं
टकसाली सिक्कों की तो बहुतायत मिलती गली गली में
कारीगरी मिले जिनमें वे कभी कभी ही मिल पाते हैं
एक और शायर कलाम पढ़ गया ज़ीस्त की महफ़िल में आ
आगे आने वाले देखें क्या क्या नज़राने [...]
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Posted on November 27, 2007 by arunima
जाने कितने लोग हुए हैं इन गज़लों के दीवाने
दीगर है ये बात मान ले कोई, चाहे न माने
देती है तारीख गवाही, ऐसे दीवाने पन की
इसने ही तो लिखवाये हैं वर्क वर्क पर अफ़साने
खतावार है कौन ? सवाली होना होता आसां है
शमा नहीं तो कुरबानी को जायें कहां पर परवाने
सुखनवरी की इन गलियों में हम भी [...]
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Posted on October 17, 2007 by arunima
कहने को कोई बात नहीं, पर बात है कुछ बेताब हैं हम
अपना ही पता मिल न पाया क्या बात है क्यों नायाब हैं हम
पलकों के दरीचे में बैठे, बस राह निहारा करते हैं
पैबस्त न होते आंखों में, कुछ ऐसे टूटे ख्वाब हैं हम
सर से छत उड़ी सहारे की दीवारें भी सब ध्वस्त हुईं
पर हिले न अपनी जड़ से [...]
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Posted on October 8, 2007 by arunima
वो एक झोंका लगा था आया यहां पे अत्तार की गली से
जो पूछा, बोला लगा के दस्तक तुम्हारे दर पर इधर बढ़ा है
तुम्हें ये शायद खबर नहीं है, मगर बताती है ये शाहकारी
बड़ी ही फ़ुरसत से ये मुजस्सिम,खुदा के हाथों गया गढ़ा है
न आई होली, न महकी सरसों न फूले टेसू, न संवरी बौरें
मगर फ़िज़ां [...]
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Posted on September 19, 2007 by arunima
दीवाली तो आई लेकिन दीपक नहीं जले
ऐसे जमे हुए रिश्ते थे, जरा नहीं पिघले
जिनसे परिचय नहीं हुए वे दुश्मन भी तो क्या
शिकवा उनसे है सीने में जो दिन रात पले
दोपहरी की धूप गंवाई इंतज़ार लेकर
अहसासों पर जमी हुई थोड़ी तो बर्फ़ गले
एक बार भी मुड़ कर उसने हमें नहीं देखा
हम अपने साये के पीछे सारी [...]
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Posted on September 10, 2007 by arunima
जो न होना था यहां, बस वो ही होता रह गया
मुस्कुराना था जिसे, वो सिर्फ़ रोता रह गया
काफ़िले दहलीज तक आये व आगे बढ़ गये
और वो गफ़लत का मारा सिर्फ़ सोता रह गया
अब्र बरसे ख्वाब के हर रात ही दालान में
एक वो था, नींद के बस बीज बोता रह गया
शेख ने तस्वीह जो दी, टूट [...]
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