Posted on September 7, 2007 by arunima
सीने में उसकी बात का खंज़र उतर गया
इक देवता था जो मेरे भीतर वो मर गया
शुबहों की गुफ़्तगू बढ़ी है इस कदर यहाँ
बेखौफ़ जो था , वो महज साये से डर गया
वो इक शजर कि जिससे थी उम्मीद छांह की
पुरबाई क्या चली कि वो जड़ से उखड़ गया
राहों को नापने में लगे रह गये [...]
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Posted on August 17, 2007 by arunima
लम्हे भर में एक दहाई का रिश्ता झट से टूटा था
मैं हैरां थी रही सोचती वो मुझसे क्योंकर रूठा था
मेरे घर की छत पर से जो बिन बरसे फिर से गुजरा है
उस बादल की खता नहीं है, मेरा ही न्यौता झूठा था
जो हासिल को अपनी कुव्वत का रह रह दे नाम रहे
उनको खबर नहीं बिल्ली के [...]
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Posted on August 10, 2007 by arunima
यों ही हम जहमतें उठाते हैं
चन्द अशआर गुनगुनाते हैं
वे बताते हैं राह दुनिया को
अपनी गलियों को भूल जाते हैं
लेते परवाज़ नहीं अब ताईर
सिर्फ़ पर अपने फ़ड़फ़ड़ाते हैं
पांव अपने ही उठ नहीं पाते
वे हमें हर लम्हे बुलाते हैं
आप कहते हैं- क्या कलाम लिखा ?
और हम हैं कि मुस्कुराते हैं
जिनको दरिया डुबो नहीं पाया
एक चुल्लू में डूब [...]
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Posted on August 7, 2007 by arunima
ज़माने भर का चलन है ऐसा खराब, हम भी गज़ल लिखें हैं
जिसे भी देखो वही कहे है जनाब, हम भी गज़ल लिखे हैं
न लालो-गुल है न मीनो-सागर,न है तबस्सुम जरा लबों पर
न जाने कोई, कहां पे छलकी शराब, हम भी गज़ल लिखे हैं
उठी हैं नजरें जिधर से गुजरे,है बात दीगर कोई न बोले
मगर छुपाये कहां [...]
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Posted on August 2, 2007 by arunima
आलिंगन में सुलगे तन की यादों वाली ये बरसात
भीगे कपड़े, सुलगे तन को देती गाली ये बरसात
अमराई में खनकाती सी चूड़ी चढ़ती पींगों में
टपक रही छत से भरती है बर्तन खाली ये बरसात
चाँद रात से महकाती सी कुछ सपने कुछ आंखों में
लाती है पहाड़ सी लम्बी, रातें काली ये बरसात
खिड़की पर बादल का टुकड़ा संदेशे [...]
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Posted on July 30, 2007 by arunima
ज़माने भर का वज़न उठा कर मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें
जो सच है उससे नजर बचा कर, मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें
हमारे सीने में जो धड़कता है तुमने उसको न दिल है माना
उसी की धड़कन हरफ़ बना कर , मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें
जनाबे मन तुम उसूल अपने लिये [...]
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Posted on June 21, 2007 by arunima
वो कहते थे चौपालों पर आज नये अफ़साने हैं
सुना, नाम बदले हैं लेकिन किस्से वही पुराने हैं
अंधों की सत्ता में मिलती रहीं रेवड़ी उनको ही
जो खुद अंधे हैं या जिनके अंधों से याराने हैं
बन कर आज मुकादम, अपने लिये कसीदे पढ़वाते
सभी जानते हैं कि पैंतरे ये उनके बचकाने हैं
पगडंडी पर बिछी हुईं हैं नजरें अपनी [...]
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Posted on June 13, 2007 by arunima
उजड़े हुए खेत ही केवल बाकी अब इस गांव में
पगडंडी पर कांटे बिखरे, छाले अनगिन पांव में
सूरज ने मौसम से मिल कर कैसे हैं षड़यंत्र रचे
आग बरसती रहती है बूढ़े बरगद की छांव में
जाने कैसे करवट लेकर वक्त पड़ा है बिस्तर पर
सरगम के सारे स्वर बन्दी, कर्कश कांव कांव में
एक नाम की खातिर वो भी [...]
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Posted on May 31, 2007 by arunima
करवट लेकर समय बदलता हमको काम बदलने होंगे
चलन ज़माने का ऐसा है, हमको नाम बदलने होंगें
साकी की आंखों से मय अब हाला बन कर उबल रही है
मयखाने में उठा जलजला, हमको जाम बदलने होंगें
अपने बूते पर मंज़िल तक चलने की अब रीत नहीं है
बैसाखी कांधों के नीचे, हमको पांव बदलने होंगे
बस्ती का मुखिया करता है चोर [...]
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Posted on May 29, 2007 by arunima
सूरज चाँद सितारे उनके गुलदानों में कैद हुए
साथ हमारा रहा निभाता, एक सिरफ़ अंधियारा ही
शहदीले सपने चाहे जितने भी भर लो आँखों में
टपकेगा उनसे जो ,होगा केवल आँसू खारा ही
चाहे देखो नफ़रत से या उसे हिकारत से देखो
अल्ला का बन्दा रहता है उसको हरदम प्यारा ही
बुझी राख को उलटो पलटो, खूब हवायें दे देखो
भड़काता है आग [...]
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