होता ज़िक्र हमारा ही

सूरज चाँद सितारे उनके गुलदानों में कैद हुए
साथ हमारा रहा निभाता, एक सिरफ़ अंधियारा ही
शहदीले सपने चाहे जितने भी भर लो आँखों में
टपकेगा उनसे जो ,होगा केवल आँसू खारा ही
चाहे देखो नफ़रत से या उसे हिकारत से देखो
अल्ला का बन्दा रहता है उसको हरदम प्यारा ही
बुझी राख को उलटो पलटो, खूब हवायें दे देखो
भड़काता है आग [...]

एक कहानी लिख देंगे

सोच रहे हैं तुम कह दो तो एक कहानी लिख देंगें
लोहू उबला नहीं हुआ है कैसे पानी लिख देंगें
कलम हो चुके हाथों में कब कलम कोई रुक पाती है
कैसे एक कलम की देखो रुकी रवानी लिख देंगें
कैद कफ़स में सुखनवरी के तायर थे जो आवारा
मोल भाव करते करते जो लुटी जवानी लिख देंगें
कासिद के हाथों [...]

उठते हैं तूफ़ान बहुत

यौं तो हम पर पहले से ही थे उनके अहसान बहुत
और मोड़ने लगे इधर जो आते हैं तूफ़ान बहुत

वक्त मिलेगा अगर कभी तो उनको शाया कर देंगे
लिख कर रखे हुए हैं हमने गज़लों के दीवान बहुत

दोमाले पर जाकर जबसे बैठे, तब से बदल गये
कल तक जिन का दावा सबसे है उनकी पहचान बहुत

साया-ए-लश्कर में चलते [...]

अब न चाहत रात की

हम मरुस्थल की जमीं से , आन में दरके बहुत
बादलों से भीख पर मांगी नहीं बरसात की
आँज कर घनश्याम हमने नैन में अब रख लिये
अब न सुरमे की , न काजल की न चाहत रात की
ढूँढ़ते  बाज़ार में   पीतल      मुलम्मा     जो चढ़ा
जब गंवा दीं स्वर्ण की जो   चूड़ियां थी हाथ की
था सुना विषधर रहा करते [...]

शोले नहीं उगलती

पहले जैसी बात नहीं हौ अब वीणा के तारों में
जयचंदों की भीड़ बढ़ी है गलियों में चौबारों में

आस्तीन के सांपों को तुम कब तक दूध पिलाओगे
फ़र्श खोदते हैं ये उसका, रहते जिन गलियारों में

एक शुआ से शीशे जैसे लम्हे भर क्या चमक गये
ख्वाबीदा हैं जर्रे बैठे  सूरज चाँद सितारों में

सावन के अंधों की क्या है [...]

कोई तो तासीर बताये

ख्वाब तोड कर पूछ रहे हैं कोई तो ताबीर बताये
भड़का कर शोले कहते हैं, कोई आ तासीर बताये
कल तक चम्बल के कछार की गुमनामी का वाशिन्दा था
आज यहां संसद के गलियारे अपनी जागीर बताये
ज़ख्म हुई जानों से हाकिम, हमदर्दी जतला कहता है
देंगे उसे सजायें , कोई  कहाँ छुपी शमशीर बताये
रामराज्य था कभी यहाँ पर, कहते [...]

बनती एक गज़ल

दर्द पिघलता रहा आँख से आंसू बन बन कर
हर्फ़ों में पिघला होता तो बनती एक गज़ल
छोड़ा नहीं आपने मेरे ख्वाबों का दामन
यादों का थामा होता तो बनती एक गज़ल
तन्हा होकर भी हम कितने तन्हा होते हैं?
सच में यदि होती तन्हाई, बनती एक गज़ल
आईने की आँखों में जो चेहरा दिखता है
उसको अगर जान पाते तो बनती [...]

झुकना हमें भी गवारा नहीं है

यूँ झुकना हमें भी गवारा नहीं है
मगर हमने बोझा उतारा नहीं है
कदम लड़खड़ाये जरा इसलिये भी
कि बैसाखियों का सहारा नहीं है
नहीं तैरता कोई ताउम्र इसमें
ये दरिया है जिसका किनारा नहीं है
ये इक सुर्ख शै जिससे दामन बचाते
ये दिल है हमारा अँगारा नहीं है
अँधेरी सियाह रात में टिमटिमाता
दिया जल रहा है, सितारा नहीं है
कभी तुम बढ़ोगे [...]

कहीं तो होगा

जाग सके मेरे लफ़्ज़ों से वह अहसास कहीं तो होगा
तुमसे बातें करते करते यह आभास कहीं तो होगा
सिंहासन पर ताजपोशियों की खातिर बढ़ती भीड़ों में
जो पत्थर को भी जीने का दे विश्वास, कहीं तो होगा
साठ बरस वादों के टुकड़ों पर पल कर भी ख्वाबीदा है
जो इन्सान बना न अब तक ज़िन्दा लाश कहीं तो होगा
बरस [...]

इस दरिया के साहिल में

जिन गज़लों के अशआरों से तुमने हमें नवाजा था
आज उन्ही को साथ लिये हम आये हैं इस महफ़िल में
राहेगुजर की तकलीफ़ों ने जितना हमें सुकून दिया
उतनी लज्जत मिली न हमको कदम चूमती मंज़िल में
लब पर खिलती हुई तबस्सुम,हँस हँस कर बतलाती है
तल्खी के कितने पैमाने छलके होंगे इस दिल में
कब सोचा था उस बूढ़े ने [...]