खंज़र उतर गया

सीने में उसकी बात का खंज़र उतर गया

इक देवता था जो मेरे भीतर वो मर गया

शुबहों की गुफ़्तगू बढ़ी है इस कदर यहाँ

बेखौफ़ जो था , वो महज साये से डर गया

वो इक शजर कि जिससे थी उम्मीद छांह की

पुरबाई क्या चली कि वो जड़ से उखड़ गया

राहों को  नापने में लगे रह   गये         कदम

मंज़िल का ख्वाब टूट कर, गिर कर बिखर गया

सरहद से दे रही थी सदा मादरे वतन

कैसा अजीब शख्स था, कलियों पे मर गया

कुछ टूटा था

लम्हे भर में एक दहाई का रिश्ता झट से टूटा था

मैं हैरां थी रही सोचती वो  मुझसे क्योंकर रूठा था

मेरे घर की छत पर से जो बिन बरसे फिर से गुजरा है

उस बादल की  खता नहीं है, मेरा ही न्यौता झूठा था

जो हासिल को अपनी कुव्वत का रह रह दे नाम रहे

उनको खबर नहीं बिल्ली के भागों से छींका टूटा था

कितनी भोली है, पागल है सब जिसको कहते हैं जनता

फिर से उसका पांव पूजती कई बरस जिसने लूटा था

थी नादान अरुणिमा कल भी, ऐर आज भी  बदल न पाई

वो अब तक वट समझी जिसको छुईमुई वाला बूटा था

अश्क आंखों के रीत जाते हैं

यों ही हम जहमतें उठाते हैं

चन्द अशआर गुनगुनाते हैं

वे बताते हैं राह दुनिया को

अपनी गलियों को भूल जाते हैं

लेते परवाज़ नहीं अब ताईर

सिर्फ़ पर अपने फ़ड़फ़ड़ाते हैं

पांव अपने ही उठ नहीं पाते

वे हमें हर लम्हे बुलाते हैं

आप कहते हैं- क्या कलाम लिखा ?

और हम हैं कि मुस्कुराते हैं

जिनको दरिया डुबो नहीं पाया

एक चुल्लू में डूब जाते हैं

उसके होठों की मय कभी पी थी

उम्र गुजरी है, लड़खड़ाते हैं

एक तस्वीर का सहारा ले

अपनी तन्हाईयां बिताते हैं

दर्द सीने में जब भी उठता है

ढाल लफ़्ज़ों में हम सुनाते हैं

अरुणिमा

हम भी गज़ल लिखे

ज़माने भर का चलन है ऐसा खराब, हम भी गज़ल लिखें हैं

जिसे भी देखो वही कहे है जनाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

न लालो-गुल है न मीनो-सागर,न है तबस्सुम जरा लबों पर

न जाने कोई, कहां पे छलकी शराब, हम भी गज़ल लिखे हैं

उठी हैं नजरें जिधर से गुजरे,है बात दीगर कोई न बोले

मगर छुपाये कहां हुपे है शबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

हमें खबर है हमें न आता सुखनवरी का ये फ़न तुम्हारा

यहां किसी ने दिया न हम पर दबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

तुम्हारी उम्मीद से अधिक हो किया है इज़हार जो ये हमने

तुम्हारी नजरों में ये बनेगा अजाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

तुम्हारी महफ़िल में कोई परदा नहीं गवारा है शायरी में

इसीलिये तो उठाई हमने नकाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

जिन्हें ये दावा गज़लसरा हैं, न उनके जैसा लिखे है कोई

बने हैं हड्डी, जहां बना है कबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

हमारी लफ़्ज़ों को अपना कह के सुना रहे हैं जो बज़्म में वे

उन्हीं की खातिर किया है हमने सबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

ये बरसात

आलिंगन में सुलगे तन की यादों वाली ये बरसात

भीगे कपड़े,  सुलगे तन को देती गाली ये बरसात

अमराई में खनकाती सी चूड़ी चढ़ती पींगों में

टपक रही छत से भरती है बर्तन खाली ये बरसात

चाँद रात से महकाती सी कुछ सपने कुछ आंखों में

लाती है पहाड़ सी लम्बी, रातें काली ये बरसात

खिड़की पर बादल का टुकड़ा संदेशे ले भेज रही

ठंडे चूल्हे, उमड़ी बाढ़ें, नजर सवाली ये बरसात

उफ़ ये मस्त बनाती मन को ठंडी ठंडी बौछारें

जाने कितनी बार और खेलेगी पाली ये बरसात

मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

ज़माने भर का वज़न उठा कर मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

जो सच है उससे नजर बचा कर, मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

हमारे सीने में जो धड़कता है तुमने उसको न दिल है माना

उसी की धड़कन हरफ़ बना कर , मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

जनाबे मन तुम उसूल अपने लिये बना कर अलग रखे हो

छुपी जो बातें, उन्हें जता कर, मैं लिख्र रही हूँ ये चन्द बातें

नजर की शाबासियां उठाये ,यही है दरकार हर नजर को

इसी से अपनी नजर चुरा कर, मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

यों वाकये हैं हज़ार लेकिन, सभी तो बनते नहीं कहानी

उन्हीं में से कुछ सजा सजा कर, मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

नकाब डाले छुपा रहे हैं मगर न जाने क्या, ये न जाना

नकाब अपनी सभी हटा कर, मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

जो लफ़्ज़ होते सुखनवरी के, रहे हैं वे अजनबी सदा ही

जो नक्शे- पा हैं, उन्हें उठाकर, मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

सब चेहरे अनजाने हैं

वो कहते थे चौपालों पर आज नये अफ़साने हैं

सुना, नाम बदले हैं लेकिन किस्से वही पुराने हैं

अंधों की सत्ता में मिलती रहीं रेवड़ी उनको ही

जो खुद अंधे हैं या जिनके अंधों से याराने हैं

बन कर आज मुकादम, अपने लिये कसीदे पढ़वाते

सभी जानते हैं कि पैंतरे ये उनके बचकाने हैं

पगडंडी पर बिछी हुईं हैं नजरें अपनी बरसों से

लेकिन शै वो नजर न आती, हम जिसके दीवाने हैं

पाता है दीदार ईश का कोई अपनी चौखट पर

और किसी को रहे छलावा देते ये बुतखाने हैं

फिर से अबकी बार दूर से सभी बहारें गुजर गईं

किसे पता है मौसम क्या क्या अपने मन में ठाने है

चलो अरुणिमा इस नगरी में कोई अपना रहा नहीं

इस नगरी के आईनों में सब चेहरे अनजाने हैं

क्या है बाकी नाम में

उजड़े हुए खेत ही केवल बाकी अब इस गांव में

पगडंडी पर कांटे बिखरे, छाले अनगिन पांव में

सूरज ने मौसम से मिल कर कैसे हैं षड़यंत्र रचे

आग बरसती रहती है बूढ़े बरगद की छांव में

जाने कैसे करवट लेकर वक्त पड़ा है बिस्तर पर

सरगम के सारे स्वर बन्दी, कर्कश कांव कांव में

एक नाम की खातिर वो भी दीवाने बन कर घूमे

कल तक जिनका खना था कुछ अर्थ नहीं है नाम में

बहुत दिनों से कलम न जागी ओढ़ उदासी जो लेटी

मिसरा कोई याद न आया इस तन्हाई शाम में

साकी ने बेचा मयखाना, शोख नजर नीलाम हुइ

लज्जत पहले सी न बाकी रही आजकल जाम में

हमको नाम बदलने होंगे

करवट लेकर समय बदलता हमको काम बदलने होंगे

चलन ज़माने का ऐसा है, हमको नाम बदलने होंगें

साकी की आंखों से मय अब हाला बन कर उबल रही है

मयखाने में उठा जलजला, हमको जाम बदलने होंगें

अपने बूते पर मंज़िल तक चलने की अब रीत नहीं है

बैसाखी कांधों के नीचे, हमको पांव  बदलने होंगे

बस्ती का मुखिया करता है चोर उचक्कों से गठबन्धन

अब गुंजाइश यहां न बाकी, हमको गांव बदलने होंगे

समझौता या सहनशीलता, जो भी चाहो नाम इसे दो

वो रहीम को अगर बदल लें हमको राम बदलने होंगें

होता ज़िक्र हमारा ही

सूरज चाँद सितारे उनके गुलदानों में कैद हुए

साथ हमारा रहा निभाता, एक सिरफ़ अंधियारा ही

शहदीले सपने चाहे जितने भी भर लो आँखों में

टपकेगा उनसे जो ,होगा केवल आँसू खारा ही

चाहे देखो नफ़रत से या उसे हिकारत से देखो

अल्ला का बन्दा रहता है उसको हरदम प्यारा ही

बुझी राख को उलटो पलटो, खूब हवायें दे देखो

भड़काता है आग परन्तु, सुलग रहा अंगारा ही

ढपली चाहे अलग अलग हों और राग अपने अपने

सबको रहा जोड़ता फिर भी केवल भाईचारा ही

ये गिटार, मेंडोलिन, बेन्जो,दो पल ही बहलाते हैं

दिल में गहरे असर करे है मीरा का इकतारा ही

महफ़िल में हैं और सुखनवर, सुना रहे नज़्में कविता

बात गज़ल की जब जब होती,होता ज़िक्र हमारा ही