Posted on May 29, 2007 by arunima
सूरज चाँद सितारे उनके गुलदानों में कैद हुए
साथ हमारा रहा निभाता, एक सिरफ़ अंधियारा ही
शहदीले सपने चाहे जितने भी भर लो आँखों में
टपकेगा उनसे जो ,होगा केवल आँसू खारा ही
चाहे देखो नफ़रत से या उसे हिकारत से देखो
अल्ला का बन्दा रहता है उसको हरदम प्यारा ही
बुझी राख को उलटो पलटो, खूब हवायें दे देखो
भड़काता है आग परन्तु, सुलग रहा अंगारा ही
ढपली चाहे अलग अलग हों और राग अपने अपने
सबको रहा जोड़ता फिर भी केवल भाईचारा ही
ये गिटार, मेंडोलिन, बेन्जो,दो पल ही बहलाते हैं
दिल में गहरे असर करे है मीरा का इकतारा ही
महफ़िल में हैं और सुखनवर, सुना रहे नज़्में कविता
बात गज़ल की जब जब होती,होता ज़िक्र हमारा ही
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Posted on May 20, 2007 by arunima
सोच रहे हैं तुम कह दो तो एक कहानी लिख देंगें
लोहू उबला नहीं हुआ है कैसे पानी लिख देंगें
कलम हो चुके हाथों में कब कलम कोई रुक पाती है
कैसे एक कलम की देखो रुकी रवानी लिख देंगें
कैद कफ़स में सुखनवरी के तायर थे जो आवारा
मोल भाव करते करते जो लुटी जवानी लिख देंगें
कासिद के हाथों भेजे जाने वाले पैगामों में
गुलशन में छाई जो सहरा की वीरानी लिख देंगें
मनमोहन की बाँसुरिया पर कितने दिल कुर्बान हुए
एक नहीं थी राधा ही उसकी दीवानी लिख देंगें
शाहराह से फ़ुटपाथों तक सिर्फ़ मुखौटे चलते हैं
कोई सूरत एक नहीं जानी पहचानी लिख देंगें
तुम जो कहते हो वैसा ही होता रहा निजामों में
तुम कह दो तो तुम को फिर जिल्ले सुभहानी लिख देंगें
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Posted on May 17, 2007 by arunima
यौं तो हम पर पहले से ही थे उनके अहसान बहुत
और मोड़ने लगे इधर जो आते हैं तूफ़ान बहुत
वक्त मिलेगा अगर कभी तो उनको शाया कर देंगे
लिख कर रखे हुए हैं हमने गज़लों के दीवान बहुत
दोमाले पर जाकर जबसे बैठे, तब से बदल गये
कल तक जिन का दावा सबसे है उनकी पहचान बहुत
साया-ए-लश्कर में चलते चलते काफ़ी निकले हैं
सीने की गहराई में पर, अब भी हैं अरमान बहुत
एक हवा के चंचल झोंके से उसकी जड़ उखड़ गई
ऊंचे होने का पीपल को कल तक रहा गुमान बहुत
राधा आकर कोई नाचे जमनाजी की रेती पर
ऐसा हुआ नहीं, हम छेड़े बाँसुरिया की तान बहुत
दर पर हमने दीं आवाज़ें लेकिन तुमने सुनी नहीं
बीच हमारे पसरा बैठा, एक बड़ा दालान बहुत
दिल के भावों कोई भी दिल मिला न राहों गलियों में
लगी हुईं हैं चौराहों पर यों दिल की दूकान बहुत
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Posted on May 2, 2007 by arunima
हम मरुस्थल की जमीं से , आन में दरके बहुत
बादलों से भीख पर मांगी नहीं बरसात की
आँज कर घनश्याम हमने नैन में अब रख लिये
अब न सुरमे की , न काजल की न चाहत रात की
ढूँढ़ते बाज़ार में पीतल मुलम्मा जो चढ़ा
जब गंवा दीं स्वर्ण की जो चूड़ियां थी हाथ की
था सुना विषधर रहा करते हैं चंदन वॄक्ष पर
फिर कहानी यह गई दुहराई, संदल-गात की
ज़िन्दगी ने इस तरह खेली सदा चौसर यहाँ
शह कभी दी ही नही थी, किन्तु फिर भी मात की
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Posted on April 30, 2007 by arunima
पहले जैसी बात नहीं हौ अब वीणा के तारों में
जयचंदों की भीड़ बढ़ी है गलियों में चौबारों में
आस्तीन के सांपों को तुम कब तक दूध पिलाओगे
फ़र्श खोदते हैं ये उसका, रहते जिन गलियारों में
एक शुआ से शीशे जैसे लम्हे भर क्या चमक गये
ख्वाबीदा हैं जर्रे बैठे सूरज चाँद सितारों में
सावन के अंधों की क्या है खता कोई बतलाये तो
फ़र्क नहीं दिखता जो उनको गुलमोहर-अंगारों में
कितना सुकूँ रहा देने में, कैसे वह यह समझेगा
जिसने सारी उमर बिताई, होकर खड़े कतारों में
माँग वक्त की सुनकर शोले नहीं उगलती जो कलमें
फ़र्क नहीं होता उनमें और कुंद पड़े हथियारों में
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Posted on April 26, 2007 by arunima
ख्वाब तोड कर पूछ रहे हैं कोई तो ताबीर बताये
भड़का कर शोले कहते हैं, कोई आ तासीर बताये
कल तक चम्बल के कछार की गुमनामी का वाशिन्दा था
आज यहां संसद के गलियारे अपनी जागीर बताये
ज़ख्म हुई जानों से हाकिम, हमदर्दी जतला कहता है
देंगे उसे सजायें , कोई कहाँ छुपी शमशीर बताये
रामराज्य था कभी यहाँ पर, कहते हैं वे, मानेंगे
एक बार आकर मारुत-सुत अपना सीना चीर दिखाये
कहने को मालिक है लेकिन हर दर पर दुत्कारी जाती
ये जिसको कहते हैं जनता ! किसको अपनी पीर बताये
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Posted on April 23, 2007 by arunima
दर्द पिघलता रहा आँख से आंसू बन बन कर
हर्फ़ों में पिघला होता तो बनती एक गज़ल
छोड़ा नहीं आपने मेरे ख्वाबों का दामन
यादों का थामा होता तो बनती एक गज़ल
तन्हा होकर भी हम कितने तन्हा होते हैं?
सच में यदि होती तन्हाई, बनती एक गज़ल
आईने की आँखों में जो चेहरा दिखता है
उसको अगर जान पाते तो बनती एक गज़ल
जश्ने-ईद-दिवाली पर कुल शहर सजाया है
मायूसी को अगर सजाते, बनती एक गज़ल
बज़्म-ए-अदब में जो भी आया है, खामोश रहा
कहता अगर मुकर्रर कोई, बनती एक गज़ल
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Posted on April 17, 2007 by arunima
यूँ झुकना हमें भी गवारा नहीं है
मगर हमने बोझा उतारा नहीं है
कदम लड़खड़ाये जरा इसलिये भी
कि बैसाखियों का सहारा नहीं है
नहीं तैरता कोई ताउम्र इसमें
ये दरिया है जिसका किनारा नहीं है
ये इक सुर्ख शै जिससे दामन बचाते
ये दिल है हमारा अँगारा नहीं है
अँधेरी सियाह रात में टिमटिमाता
दिया जल रहा है, सितारा नहीं है
कभी तुम बढ़ोगे हमारी भी जानिब
किया तुमने ऐसा इशारा नहीं है
अभी हमने हलकी सी आवाज़ दी है
कहाँ चल दिये तुम ? पुकारा नहीं है
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Posted on April 16, 2007 by arunima
जाग सके मेरे लफ़्ज़ों से वह अहसास कहीं तो होगा
तुमसे बातें करते करते यह आभास कहीं तो होगा
सिंहासन पर ताजपोशियों की खातिर बढ़ती भीड़ों में
जो पत्थर को भी जीने का दे विश्वास, कहीं तो होगा
साठ बरस वादों के टुकड़ों पर पल कर भी ख्वाबीदा है
जो इन्सान बना न अब तक ज़िन्दा लाश कहीं तो होगा
बरस बरस के आश्वासन ने जिनको सर पर छांह नहीं दी
उनके सर पर तने एक मुट्ठी आकाश कहीं तो होगा
लैला,शीरीं और ज़ुलेखा से आगे की उल्फ़त लेकर
खुद को फिर से लिखता जाये वो इतिहास कहीं तो होगा
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Posted on April 11, 2007 by arunima
जिन गज़लों के अशआरों से तुमने हमें नवाजा था
आज उन्ही को साथ लिये हम आये हैं इस महफ़िल में
राहेगुजर की तकलीफ़ों ने जितना हमें सुकून दिया
उतनी लज्जत मिली न हमको कदम चूमती मंज़िल में
लब पर खिलती हुई तबस्सुम,हँस हँस कर बतलाती है
तल्खी के कितने पैमाने छलके होंगे इस दिल में
कब सोचा था उस बूढ़े ने ऐसा भी दिन आयेगा
फ़र्क न होगा जिस दिन कोई, हुक्कामों में कातिल में
रुख हमने इसलिये सफ़ीने का मौजों के साथ किया
अब पहले सी बात नहीं है, इस दरिया के साहिल में
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