प्रश्नों के उत्तर

 सभी आदरणीय अग्रजों के स्नेह को अल्फ़ाज़ बयान नहीं कर सकते. मेरी यह प्रस्तुति आपके कसौटी पर कैसी उतरेगी, इस की प्रतीक्षा रहेगी.

जितने भी उठते सवाल हैं उनके उत्तर आँसू हैं

जिस पर आकर रुके हुए हम, उसी द्वार पर आंसू हैं

साथ छोड़ कर गया हर बशर, सब मौके के साथी थे

साथ निभाता रहे हमारा,जो कि उमर भर आँसू हैं

यादों की गठरी को जब भी कभी कुरेदे तन्हाई

पाती परत परत में उसने रखे सँजोकर आँसू हैं

तुमने कहा बरसता सावन, लेकिन घटा बताती है

बादल का जो हाथ छोड़कर आये चलकर आँसू हैण

सागर ने बतलाया अपने खारेपन का यह कारण

पर्वत ने भेजे हैं उसको नदिया भर भर आँसू हैं

खुशियां हों या गम हों,आँखें दुल्हन की हों, विधवा की

अपना अहद निभाते हर दम आते चल कर आँसू हैं

अरुणिम शुआ सुबह की शबनम को सहला बतलाती है

चन्दा की आँखों से टपका किये रात भर आँसू हैं

Advertisements

हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

 दोस्तो

काफ़ी दिनों से इतने अच्छे ब्लाग पढ़ने के बाद दोचा कि मैं भी अपना योग दूँ. इसलिये यह मेरी पहली पोस्ट आपके समक्ष प्रस्तुत है. एक गज़ल के साथ

न जाने कितने दरद सजाकर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

छुपाये कुछ, कुछ किये उजागर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

जो रह गया है परे पलक के वो कोई दामन था या भरम था

अजीब से यों सवाल लाकर हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

जो रक्सां है हर हरफ़ हरफ़ में, वो ख्याल है किस मुजस्सिमे   का

कि जिसकी रंगत चुरा चुरा कर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

हाँ शोख नजरों की चंद अनियाँ, कभी इधर से गुजर गईं थीं

ये मौसमों को गवाह बना कर हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

ये दीद-ए-तर जो देखते हो, नहीं हैं रंजो-गमों की खातिर

रुला गया कोई याद आकर, जो अपनी गज़लों में रख रहे हैं

जो नजरें अपनी चुरा के गुजरे,हमारा तआर्रुफ़ थे कुछ दिनों तक

उन्हीं लम्हों की मजार लाकर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

उमर के शफ़्फ़ाक दरपनों में, पड़ी हैं जितनी दरार अब तक

उन्ही की किरचें उठा उठा कर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

ये नज़्में, गज़लें, कतए, रुबाई, सभी हैं रूदादे – ज़िन्दगी बस

यही तरन्नुम में अपने गाकर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

Hello world!

 दोस्तो

काफ़ी दिनों से इतने अच्छे ब्लाग पढ़ने के बाद दोचा कि मैं भी अपना योग दूँ. इसलिये यह मेरी पहली पोस्ट आपके समक्ष प्रस्तुत है. एक गज़ल के साथ

न जाने कितने दरद सजाकर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

छुपाये कुछ, कुछ किये उजागर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

जो रह गया है परे पलक के वो कोई दामन था या भरम था

अजीब से यों सवाल लाकर हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

जो रक्सां है हर हरफ़ हरफ़ में, वो ख्याल है किस मुजस्सिमे   का

कि जिसकी रंगत चुरा चुरा कर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

हाँ शोख नजरों की चंद अनियाँ, कभी इधर से गुजर गईं थीं

ये मौसमों को गवाह बना कर हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

ये दीद-ए-तर जो देखते हो, नहीं हैं रंजो-गमों की खातिर

रुला गया कोई याद आकर, जो अपनी गज़लों में रख रहे हैं

जो नजरें अपनी चुरा के गुजरे,हमारा तआर्रुफ़ थे कुछ दिनों तक

उन्हीं लम्हों की मजार लाकर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

उमर के शफ़्फ़ाक दरपनों में, पड़ी हैं जितनी दरार अब तक

उन्ही की किरचें उठा उठा कर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

ये नज़्में, गज़लें, कतए, रुबाई, सभी हैं रूदादे – ज़िन्दगी बस

यही तरन्नुम में अपने गाकर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं