Hello world!

 दोस्तो

काफ़ी दिनों से इतने अच्छे ब्लाग पढ़ने के बाद दोचा कि मैं भी अपना योग दूँ. इसलिये यह मेरी पहली पोस्ट आपके समक्ष प्रस्तुत है. एक गज़ल के साथ

न जाने कितने दरद सजाकर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

छुपाये कुछ, कुछ किये उजागर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

जो रह गया है परे पलक के वो कोई दामन था या भरम था

अजीब से यों सवाल लाकर हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

जो रक्सां है हर हरफ़ हरफ़ में, वो ख्याल है किस मुजस्सिमे   का

कि जिसकी रंगत चुरा चुरा कर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

हाँ शोख नजरों की चंद अनियाँ, कभी इधर से गुजर गईं थीं

ये मौसमों को गवाह बना कर हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

ये दीद-ए-तर जो देखते हो, नहीं हैं रंजो-गमों की खातिर

रुला गया कोई याद आकर, जो अपनी गज़लों में रख रहे हैं

जो नजरें अपनी चुरा के गुजरे,हमारा तआर्रुफ़ थे कुछ दिनों तक

उन्हीं लम्हों की मजार लाकर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

उमर के शफ़्फ़ाक दरपनों में, पड़ी हैं जितनी दरार अब तक

उन्ही की किरचें उठा उठा कर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

ये नज़्में, गज़लें, कतए, रुबाई, सभी हैं रूदादे – ज़िन्दगी बस

यही तरन्नुम में अपने गाकर, हम अपनी गज़लों में रख रहे हैं

5 Responses

  1. स्वागत है आपका। अच्छी ग़ज़ल लिखी है।

  2. बहुत खूब आपका स्वागत है हिन्दी चिट्ठाजगत में। सर्वज्ञ के [url=http://akshargram.com/sarvagya/index.php/welcome]स्वागत पृष्ठ[/url] पर अवश्य जाइए।

  3. हिन्दी चिट्ठे जगत में स्वागत है।

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