प्रश्नों के उत्तर

 सभी आदरणीय अग्रजों के स्नेह को अल्फ़ाज़ बयान नहीं कर सकते. मेरी यह प्रस्तुति आपके कसौटी पर कैसी उतरेगी, इस की प्रतीक्षा रहेगी.

जितने भी उठते सवाल हैं उनके उत्तर आँसू हैं

जिस पर आकर रुके हुए हम, उसी द्वार पर आंसू हैं

साथ छोड़ कर गया हर बशर, सब मौके के साथी थे

साथ निभाता रहे हमारा,जो कि उमर भर आँसू हैं

यादों की गठरी को जब भी कभी कुरेदे तन्हाई

पाती परत परत में उसने रखे सँजोकर आँसू हैं

तुमने कहा बरसता सावन, लेकिन घटा बताती है

बादल का जो हाथ छोड़कर आये चलकर आँसू हैण

सागर ने बतलाया अपने खारेपन का यह कारण

पर्वत ने भेजे हैं उसको नदिया भर भर आँसू हैं

खुशियां हों या गम हों,आँखें दुल्हन की हों, विधवा की

अपना अहद निभाते हर दम आते चल कर आँसू हैं

अरुणिम शुआ सुबह की शबनम को सहला बतलाती है

चन्दा की आँखों से टपका किये रात भर आँसू हैं

4 Responses

  1. वाह बहुत खूब, अरुणिमा परिचर्चा फोरम की सदस्या भी बनें और महफ़िल की रौनक बढ़ाएं।

  2. बढ़िया है। लेकिन आंसू बहुत हो गये।

  3. इतने आँसू आपके….एक हमारा भी

    देखो कैसे उलझा है….
    यह भाव ख्यालों में…
    जैसे कोई बदली बिखरी हो पहाड़ों में….
    कुछ अँधेरा सा…गम का साया सा….
    कुछ समां बोझिल है…
    कुछ पलक भारी है….
    ऐसा लगता है…..
    बदली यह…..
    बरसेगी गालों पर….

    अच्छी लगी रचना….पर आँसू कभी उत्तर नहीं लगे…..उत्तर तक पहुँचने से पहले वाला पड़ाव।

  4. बेजी
    मैने कहा रहे हैं उत्तर
    आँसू मेरे प्रश्नों के
    तानी साथ शब्द ने छोड़ा
    वाणी ने भी रिश्ता तोड़ा
    और साथ जो रहा निभाता
    केवल अपने आंसू थे.
    जब उत्तर की गुंजाईश भी
    नहीं सामने आ पाती
    ताब आंखों सेआंसू बहकर
    ही उत्तर बन जाते हैं.

    श्रीशजी तथा अनूपजी. आपका शुक्रिया

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