शोले नहीं उगलती

पहले जैसी बात नहीं हौ अब वीणा के तारों में

जयचंदों की भीड़ बढ़ी है गलियों में चौबारों में

आस्तीन के सांपों को तुम कब तक दूध पिलाओगे

फ़र्श खोदते हैं ये उसका, रहते जिन गलियारों में

एक शुआ से शीशे जैसे लम्हे भर क्या चमक गये

ख्वाबीदा हैं जर्रे बैठे  सूरज चाँद सितारों में

सावन के अंधों की क्या है खता कोई बतलाये तो

फ़र्क नहीं दिखता जो उनको गुलमोहर-अंगारों  में

कितना सुकूँ रहा देने में, कैसे वह यह समझेगा

जिसने सारी उमर बिताई, होकर खड़े कतारों में

माँग वक्त की सुनकर शोले नहीं उगलती जो कलमें

फ़र्क नहीं होता उनमें और कुंद पड़े हथियारों में

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कोई तो तासीर बताये

ख्वाब तोड कर पूछ रहे हैं कोई तो ताबीर बताये

भड़का कर शोले कहते हैं, कोई आ तासीर बताये

कल तक चम्बल के कछार की गुमनामी का वाशिन्दा था

आज यहां संसद के गलियारे अपनी जागीर बताये

ज़ख्म हुई जानों से हाकिम, हमदर्दी जतला कहता है

देंगे उसे सजायें , कोई  कहाँ छुपी शमशीर बताये

रामराज्य था कभी यहाँ पर, कहते हैं वे, मानेंगे

एक बार आकर मारुत-सुत अपना सीना चीर दिखाये

कहने को मालिक है लेकिन हर दर पर दुत्कारी जाती

ये जिसको कहते हैं जनता ! किसको अपनी पीर बताये

बनती एक गज़ल

दर्द पिघलता रहा आँख से आंसू बन बन कर

हर्फ़ों में पिघला होता तो बनती एक गज़ल

छोड़ा नहीं आपने मेरे ख्वाबों का दामन

यादों का थामा होता तो बनती एक गज़ल

तन्हा होकर भी हम कितने तन्हा होते हैं?

सच में यदि होती तन्हाई, बनती एक गज़ल

आईने की आँखों में जो चेहरा दिखता है

उसको अगर जान पाते तो बनती एक गज़ल

जश्ने-ईद-दिवाली पर कुल शहर सजाया है

मायूसी को अगर सजाते, बनती एक गज़ल

बज़्म-ए-अदब में जो भी आया है, खामोश रहा

कहता अगर मुकर्रर कोई, बनती एक गज़ल

झुकना हमें भी गवारा नहीं है

यूँ झुकना हमें भी गवारा नहीं है

मगर हमने बोझा उतारा नहीं है

कदम लड़खड़ाये जरा इसलिये भी

कि बैसाखियों का सहारा नहीं है

नहीं तैरता कोई ताउम्र इसमें

ये दरिया है जिसका किनारा नहीं है

ये इक सुर्ख शै जिससे दामन बचाते

ये दिल है हमारा अँगारा नहीं है

अँधेरी सियाह रात में टिमटिमाता

दिया जल रहा है, सितारा नहीं है

कभी तुम बढ़ोगे हमारी भी जानिब

किया तुमने ऐसा इशारा नहीं है

अभी हमने हलकी सी आवाज़ दी है

कहाँ चल दिये तुम ? पुकारा नहीं है

कहीं तो होगा

जाग सके मेरे लफ़्ज़ों से वह अहसास कहीं तो होगा

तुमसे बातें करते करते यह आभास कहीं तो होगा

सिंहासन पर ताजपोशियों की खातिर बढ़ती भीड़ों में

जो पत्थर को भी जीने का दे विश्वास, कहीं तो होगा

साठ बरस वादों के टुकड़ों पर पल कर भी ख्वाबीदा है

जो इन्सान बना न अब तक ज़िन्दा लाश कहीं तो होगा

बरस बरस के आश्वासन ने जिनको सर पर छांह नहीं दी

उनके सर पर तने एक मुट्ठी आकाश कहीं तो होगा

लैला,शीरीं और ज़ुलेखा से आगे की उल्फ़त लेकर

खुद को फिर से लिखता जाये वो इतिहास कहीं तो होगा

इस दरिया के साहिल में

जिन गज़लों के अशआरों से तुमने हमें नवाजा था

आज उन्ही को साथ लिये हम आये हैं इस महफ़िल में

राहेगुजर की तकलीफ़ों ने जितना हमें सुकून दिया

उतनी लज्जत मिली न हमको कदम चूमती मंज़िल में

लब पर खिलती हुई तबस्सुम,हँस हँस कर बतलाती है

तल्खी के कितने पैमाने छलके होंगे इस दिल में

कब सोचा था उस बूढ़े ने ऐसा भी दिन आयेगा

फ़र्क न होगा जिस दिन कोई, हुक्कामों में कातिल में

रुख हमने इसलिये सफ़ीने का मौजों के साथ किया

अब पहले सी बात नहीं है, इस दरिया के साहिल में

तलवार बने

फिर से गली मोहल्लों में है लगता कुछ हथियार तने

नफ़रत को कुछ और हवा देनेवाले औज़ार बने

साम्प्रदायिकता के अलाव पर ताप रहे हैं हाथों को

अपना उल्लू सीधा करने की खातिर मुख्त्यार बने

कल तक टूटे फ़ालों वाले रहे भौंथरे चाकू जो

ज्यों ही लगा हाथ में मौका, नाम बदल तलवार बने

खबर इन्हें है साहिल बनना एक शहादत होती है

इसीलिये तो नाव डुबोने वाली ये मंझधार बने

बार बार ये लगा मुखौटे, लिये कुदाली खोद रहे

ये न चाहते जमीं दोस्ती की आखिर हमवार बने