हमको नाम बदलने होंगे

करवट लेकर समय बदलता हमको काम बदलने होंगे

चलन ज़माने का ऐसा है, हमको नाम बदलने होंगें

साकी की आंखों से मय अब हाला बन कर उबल रही है

मयखाने में उठा जलजला, हमको जाम बदलने होंगें

अपने बूते पर मंज़िल तक चलने की अब रीत नहीं है

बैसाखी कांधों के नीचे, हमको पांव  बदलने होंगे

बस्ती का मुखिया करता है चोर उचक्कों से गठबन्धन

अब गुंजाइश यहां न बाकी, हमको गांव बदलने होंगे

समझौता या सहनशीलता, जो भी चाहो नाम इसे दो

वो रहीम को अगर बदल लें हमको राम बदलने होंगें

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होता ज़िक्र हमारा ही

सूरज चाँद सितारे उनके गुलदानों में कैद हुए

साथ हमारा रहा निभाता, एक सिरफ़ अंधियारा ही

शहदीले सपने चाहे जितने भी भर लो आँखों में

टपकेगा उनसे जो ,होगा केवल आँसू खारा ही

चाहे देखो नफ़रत से या उसे हिकारत से देखो

अल्ला का बन्दा रहता है उसको हरदम प्यारा ही

बुझी राख को उलटो पलटो, खूब हवायें दे देखो

भड़काता है आग परन्तु, सुलग रहा अंगारा ही

ढपली चाहे अलग अलग हों और राग अपने अपने

सबको रहा जोड़ता फिर भी केवल भाईचारा ही

ये गिटार, मेंडोलिन, बेन्जो,दो पल ही बहलाते हैं

दिल में गहरे असर करे है मीरा का इकतारा ही

महफ़िल में हैं और सुखनवर, सुना रहे नज़्में कविता

बात गज़ल की जब जब होती,होता ज़िक्र हमारा ही

एक कहानी लिख देंगे

सोच रहे हैं तुम कह दो तो एक कहानी लिख देंगें

लोहू उबला नहीं हुआ है कैसे पानी लिख देंगें

कलम हो चुके हाथों में कब कलम कोई रुक पाती है

कैसे एक कलम की देखो रुकी रवानी लिख देंगें

कैद कफ़स में सुखनवरी के तायर थे जो आवारा

मोल भाव करते करते जो लुटी जवानी लिख देंगें

कासिद के हाथों भेजे जाने वाले पैगामों में

गुलशन में छाई जो सहरा की वीरानी लिख देंगें

मनमोहन की बाँसुरिया पर कितने दिल कुर्बान हुए

एक नहीं थी राधा ही उसकी दीवानी लिख देंगें

शाहराह से फ़ुटपाथों तक सिर्फ़ मुखौटे चलते हैं

कोई सूरत एक नहीं जानी पहचानी लिख देंगें

तुम जो कहते हो वैसा ही होता रहा निजामों में

तुम कह दो तो तुम को फिर जिल्ले सुभहानी लिख देंगें

उठते हैं तूफ़ान बहुत

यौं तो हम पर पहले से ही थे उनके अहसान बहुत

और मोड़ने लगे इधर जो आते हैं तूफ़ान बहुत

वक्त मिलेगा अगर कभी तो उनको शाया कर देंगे

लिख कर रखे हुए हैं हमने गज़लों के दीवान बहुत

दोमाले पर जाकर जबसे बैठे, तब से बदल गये

कल तक जिन का दावा सबसे है उनकी पहचान बहुत

साया-ए-लश्कर में चलते चलते काफ़ी   निकले हैं

सीने की गहराई में पर, अब भी हैं अरमान बहुत

एक हवा के चंचल झोंके से उसकी जड़ उखड़ गई

ऊंचे होने का पीपल को कल तक रहा गुमान बहुत

राधा आकर कोई नाचे जमनाजी की रेती पर

ऐसा हुआ नहीं, हम छेड़े बाँसुरिया की तान बहुत

दर पर हमने दीं आवाज़ें लेकिन तुमने सुनी नहीं

बीच हमारे पसरा बैठा, एक बड़ा दालान बहुत

दिल के भावों कोई भी दिल मिला न राहों गलियों में

लगी हुईं हैं चौराहों पर यों दिल की दूकान बहुत

अब न चाहत रात की

हम मरुस्थल की जमीं से , आन में दरके बहुत

बादलों से भीख पर मांगी नहीं बरसात की

आँज कर घनश्याम हमने नैन में अब रख लिये

अब न सुरमे की , न काजल की न चाहत रात की

ढूँढ़ते  बाज़ार में   पीतल      मुलम्मा     जो चढ़ा

जब गंवा दीं स्वर्ण की जो   चूड़ियां थी हाथ की

था सुना विषधर रहा करते हैं चंदन वॄक्ष पर

फिर कहानी यह गई दुहराई, संदल-गात की

ज़िन्दगी ने इस तरह खेली सदा चौसर यहाँ

शह कभी दी ही नही थी, किन्तु फिर भी मात की