हमको नाम बदलने होंगे

करवट लेकर समय बदलता हमको काम बदलने होंगे

चलन ज़माने का ऐसा है, हमको नाम बदलने होंगें

साकी की आंखों से मय अब हाला बन कर उबल रही है

मयखाने में उठा जलजला, हमको जाम बदलने होंगें

अपने बूते पर मंज़िल तक चलने की अब रीत नहीं है

बैसाखी कांधों के नीचे, हमको पांव  बदलने होंगे

बस्ती का मुखिया करता है चोर उचक्कों से गठबन्धन

अब गुंजाइश यहां न बाकी, हमको गांव बदलने होंगे

समझौता या सहनशीलता, जो भी चाहो नाम इसे दो

वो रहीम को अगर बदल लें हमको राम बदलने होंगें

4 Responses

  1. बहुत सुन्दर रचन है।

    अपने बूते पर मंज़िल तक चलने की अब रीत नहीं है

    बैसाखी कांधों के नीचे, हमको पांव बदलने होंगे

    बस्ती का मुखिया करता है चोर उचक्कों से गठबन्धन

    अब गुंजाइश यहां न बाकी, हमको गांव बदलने होंगे

  2. ये पंक्तियां अच्छी लगीं । आज के सन्दर्भ में गहरा अर्थ रखती है ।

    >समझौता या सहनशीलता, जो भी चाहो नाम इसे दो
    >वो रहीम को अगर बदल लें हमको राम बदलने होंगें

  3. blogs par achee rachnaen sulabh hone se uski pahunch seedhe bade paimane par hotee hai aur isko kayam rakhne se sahity ko naee dishaa milne kee ummid hai.Koshis kable taareef hai.

  4. आपने रचना में भारत की वर्तमान हकीकत बयां की है। राजनेताओं के मुंह पर करारा तमाचा जड्ने के लिये आपका धन्यवाद्।

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