सब चेहरे अनजाने हैं

वो कहते थे चौपालों पर आज नये अफ़साने हैं

सुना, नाम बदले हैं लेकिन किस्से वही पुराने हैं

अंधों की सत्ता में मिलती रहीं रेवड़ी उनको ही

जो खुद अंधे हैं या जिनके अंधों से याराने हैं

बन कर आज मुकादम, अपने लिये कसीदे पढ़वाते

सभी जानते हैं कि पैंतरे ये उनके बचकाने हैं

पगडंडी पर बिछी हुईं हैं नजरें अपनी बरसों से

लेकिन शै वो नजर न आती, हम जिसके दीवाने हैं

पाता है दीदार ईश का कोई अपनी चौखट पर

और किसी को रहे छलावा देते ये बुतखाने हैं

फिर से अबकी बार दूर से सभी बहारें गुजर गईं

किसे पता है मौसम क्या क्या अपने मन में ठाने है

चलो अरुणिमा इस नगरी में कोई अपना रहा नहीं

इस नगरी के आईनों में सब चेहरे अनजाने हैं

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क्या है बाकी नाम में

उजड़े हुए खेत ही केवल बाकी अब इस गांव में

पगडंडी पर कांटे बिखरे, छाले अनगिन पांव में

सूरज ने मौसम से मिल कर कैसे हैं षड़यंत्र रचे

आग बरसती रहती है बूढ़े बरगद की छांव में

जाने कैसे करवट लेकर वक्त पड़ा है बिस्तर पर

सरगम के सारे स्वर बन्दी, कर्कश कांव कांव में

एक नाम की खातिर वो भी दीवाने बन कर घूमे

कल तक जिनका खना था कुछ अर्थ नहीं है नाम में

बहुत दिनों से कलम न जागी ओढ़ उदासी जो लेटी

मिसरा कोई याद न आया इस तन्हाई शाम में

साकी ने बेचा मयखाना, शोख नजर नीलाम हुइ

लज्जत पहले सी न बाकी रही आजकल जाम में