मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

ज़माने भर का वज़न उठा कर मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

जो सच है उससे नजर बचा कर, मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

हमारे सीने में जो धड़कता है तुमने उसको न दिल है माना

उसी की धड़कन हरफ़ बना कर , मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

जनाबे मन तुम उसूल अपने लिये बना कर अलग रखे हो

छुपी जो बातें, उन्हें जता कर, मैं लिख्र रही हूँ ये चन्द बातें

नजर की शाबासियां उठाये ,यही है दरकार हर नजर को

इसी से अपनी नजर चुरा कर, मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

यों वाकये हैं हज़ार लेकिन, सभी तो बनते नहीं कहानी

उन्हीं में से कुछ सजा सजा कर, मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

नकाब डाले छुपा रहे हैं मगर न जाने क्या, ये न जाना

नकाब अपनी सभी हटा कर, मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

जो लफ़्ज़ होते सुखनवरी के, रहे हैं वे अजनबी सदा ही

जो नक्शे- पा हैं, उन्हें उठाकर, मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

6 Responses

  1. आपकी पिछली रचनायें ज़ादा अच्छी लगीं थीं।

    लिखती रहें।

  2. नकाब अपनी सभी हटा कर, मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

    ये जो आत्मविश्वास है वह कविता कहने वालों में ही नज़र आता है.
    क्या खू़ब कहन बनी है इस अभिव्यक्ति में .
    ऐसी रचनाएँ लेखनी का सुयश बढा़ती हैं.
    सा धु वा द.

  3. बहुत खूब. रुक कर आये, बेहतरीन आये.

    ज़माने भर का वज़न उठा कर मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें
    जो सच है उससे नजर बचा कर, मैं लिख रही हूँ ये चन्द बातें

    —वाह!! दाद कबूलें.

  4. हमेशा की तरह बहुत ही सुन्दर मधुरिमा जी!

  5. आपकी पिछली रचनाओं जैसा आनंद नहीं आ पाया इस रचना में !

  6. आप सभी का धन्यवाद. कंचनजी मेरा नाम बदल देने के लिये आपका धन्यवाद. संभवत: आपने सुझाव देना चाहा है परन्तु मुझे अपना नाम अरुणिमा ही पसन्द है.

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