कुछ टूटा था

लम्हे भर में एक दहाई का रिश्ता झट से टूटा था

मैं हैरां थी रही सोचती वो  मुझसे क्योंकर रूठा था

मेरे घर की छत पर से जो बिन बरसे फिर से गुजरा है

उस बादल की  खता नहीं है, मेरा ही न्यौता झूठा था

जो हासिल को अपनी कुव्वत का रह रह दे नाम रहे

उनको खबर नहीं बिल्ली के भागों से छींका टूटा था

कितनी भोली है, पागल है सब जिसको कहते हैं जनता

फिर से उसका पांव पूजती कई बरस जिसने लूटा था

थी नादान अरुणिमा कल भी, ऐर आज भी  बदल न पाई

वो अब तक वट समझी जिसको छुईमुई वाला बूटा था

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अश्क आंखों के रीत जाते हैं

यों ही हम जहमतें उठाते हैं

चन्द अशआर गुनगुनाते हैं

वे बताते हैं राह दुनिया को

अपनी गलियों को भूल जाते हैं

लेते परवाज़ नहीं अब ताईर

सिर्फ़ पर अपने फ़ड़फ़ड़ाते हैं

पांव अपने ही उठ नहीं पाते

वे हमें हर लम्हे बुलाते हैं

आप कहते हैं- क्या कलाम लिखा ?

और हम हैं कि मुस्कुराते हैं

जिनको दरिया डुबो नहीं पाया

एक चुल्लू में डूब जाते हैं

उसके होठों की मय कभी पी थी

उम्र गुजरी है, लड़खड़ाते हैं

एक तस्वीर का सहारा ले

अपनी तन्हाईयां बिताते हैं

दर्द सीने में जब भी उठता है

ढाल लफ़्ज़ों में हम सुनाते हैं

अरुणिमा

हम भी गज़ल लिखे

ज़माने भर का चलन है ऐसा खराब, हम भी गज़ल लिखें हैं

जिसे भी देखो वही कहे है जनाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

न लालो-गुल है न मीनो-सागर,न है तबस्सुम जरा लबों पर

न जाने कोई, कहां पे छलकी शराब, हम भी गज़ल लिखे हैं

उठी हैं नजरें जिधर से गुजरे,है बात दीगर कोई न बोले

मगर छुपाये कहां हुपे है शबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

हमें खबर है हमें न आता सुखनवरी का ये फ़न तुम्हारा

यहां किसी ने दिया न हम पर दबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

तुम्हारी उम्मीद से अधिक हो किया है इज़हार जो ये हमने

तुम्हारी नजरों में ये बनेगा अजाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

तुम्हारी महफ़िल में कोई परदा नहीं गवारा है शायरी में

इसीलिये तो उठाई हमने नकाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

जिन्हें ये दावा गज़लसरा हैं, न उनके जैसा लिखे है कोई

बने हैं हड्डी, जहां बना है कबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

हमारी लफ़्ज़ों को अपना कह के सुना रहे हैं जो बज़्म में वे

उन्हीं की खातिर किया है हमने सबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

ये बरसात

आलिंगन में सुलगे तन की यादों वाली ये बरसात

भीगे कपड़े,  सुलगे तन को देती गाली ये बरसात

अमराई में खनकाती सी चूड़ी चढ़ती पींगों में

टपक रही छत से भरती है बर्तन खाली ये बरसात

चाँद रात से महकाती सी कुछ सपने कुछ आंखों में

लाती है पहाड़ सी लम्बी, रातें काली ये बरसात

खिड़की पर बादल का टुकड़ा संदेशे ले भेज रही

ठंडे चूल्हे, उमड़ी बाढ़ें, नजर सवाली ये बरसात

उफ़ ये मस्त बनाती मन को ठंडी ठंडी बौछारें

जाने कितनी बार और खेलेगी पाली ये बरसात