नायाब हैं हम

कहने को कोई बात नहीं, पर बात है कुछ बेताब हैं हम

अपना ही पता मिल न पाया क्या बात है क्यों नायाब हैं हम

पलकों के दरीचे में बैठे, बस राह निहारा करते हैं

पैबस्त न होते आंखों  में, कुछ ऐसे टूटे ख्वाब हैं हम

सर से छत उड़ी सहारे की दीवारें भी सब ध्वस्त हुईं

पर हिले न अपनी जड़ से जो दालानों के महराब हैं हम

है एक दायरा जीने का जिससे हम निकले नहीं कभी

है और किसी से काम नहीं, मावस्या के महताब हैं हम

सहरा की धूलों में लिपटे हैं सभी आबले पांवों के

राहें तबील सूखे लब हैं चलते रहते बेआब हैं हम

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अत्तार की गली से

वो एक झोंका लगा था आया यहां पे अत्तार की गली से

जो पूछा, बोला लगा के दस्तक तुम्हारे दर पर इधर बढ़ा है

तुम्हें ये शायद खबर नहीं है, मगर बताती है ये शाहकारी

बड़ी ही फ़ुरसत से ये मुजस्सिम,खुदा के हाथों गया गढ़ा है

न आई होली, न महकी सरसों न फूले टेसू, न संवरी बौरें

मगर फ़िज़ां पे अजीब सा ये खुमार फिर भी लगा चढ़ा है

ये गेसुओं से गिरा है गौहर, या दीद-ए-तर का कोई मोती

जो खिल रहा है कँवल के लब पर, कहां से कोई कहो झड़ा है

न फूल खिलते, न भंवरे गूंजें, न उड़ती तितली, न चहके चिड़िया

न जाने कब से खिज़ां को ओढ़े, ये एक गुलशन यहां खड़ा है