आज सुना जाते हैं

वो लिख देते रोज और हम कभी कभी ही लिख पाते हैं
वो कहते हर बात, हमें क्या कहना सोच नहीं पाते हैं
टकसाली सिक्कों की तो बहुतायत मिलती गली गली में
कारीगरी मिले जिनमें वे कभी कभी ही मिल पाते हैं
एक और शायर कलाम पढ़ गया ज़ीस्त की महफ़िल में आ
आगे  आने   वाले   देखें   क्या    क्या   नज़राने लाते हैं
जो  मशाल ले    राहनुमाई    की     बातें करते रहते हैं
शाम ढले पर चौराहों के वे ही दिये बुझा जाते हैं
कल ये मौसम हो या न हो, कल ये चज़्म रहे या उजड़े
यही सोच कर हाले दिल हम अपना आज सुना जाते हैं
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