राम नहीं हो

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नाम ढूँढ़ते हैं इक ऐसा, जैसा कोई नाम नहीं हो
सूरज निकले दोपहरी हो, लेकिन उसकी शाम नहीं हो
हमसे  सबको उम्मीदें हैं, जुदा नहीं हो तुम भी इससे
हम तो बन जायेंगे लक्षमण, लेकिन तुम ही राम नहीं हो
किस्सागोई की आदत तो साथ रही अपने सदियों से
लेकिन फिर भी ये चाहा है सारे किस्से आम नहीं हो
ज़ुल्फ़ों के घिर आये साये तो फिर हुई आरज़ू मन में
घटा घिरी ही रहे इस तरह, और कभी भी घाम नहीं हो
उनकी यादों ने यों घेराने घेरा आकर के मेरी गलियों को
ऐसा लम्हा ढूँढ़ रहे हैं जब हाथों में जाम नहीं हो
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