पत्थर बहुत सारे

उड़ रहे हैं अब हवा में पर बहुत सारे

झुक रहे हैं पांव में अब सर बहुत सारे

क्या वज़ह थी कोई भी ये जान न पाया

बस्तियों में जल रहे हैं घर बहुत सारे

एक दो हों तो मुनासिब, सामना कर लें

ज़िन्दगी के सामने हैं डर बहुत सारे

हो नहीं पाया नफ़े का कोई भी सौदा

एक तनख्वाह और उस पर कर बहुत सारे

एक आंधी, एक तूफ़ां, एक है बारिश

इक दिलासा, हैं यहां छप्पर बहुत सारे

इल्तिजायें सब अधूरी ही रहीं आखिर

एक मज़नूं और हैं पत्थर बहुत सारे

चल रहे हैं राह में रंगीन ले हसरत

चुभ रहे हैं  पांव में कंकर बहुत सारे

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