वैसा तो कुछ कहा नहीं था

तुमने जो कुछ समझा, हमने  वैसा तो कुछ कहा नहीं था
क्योंकि अपरिचय का जो पुल था बीच हमारे ढहा नहीं था
 
कैसे हम उनके अश्कों की कथा  ज़माने को    बतलाते
जो कुछ उन पर बीता, हमने वैसा कुछ भी सहा नहीं था
 
जाने कैसे डूब गये वो, न तो खबर     बाढ़ की आई
बाँध तोड़ कर रेला भी कोई बस्ती में बहा नहीं था
 
स्थितियों   के   लाक्षागॄह   में जीवन  ,घेरे है   दावानल
मन हो गया युधिष्ठिर अविचल, लेश मात्र भी दहा नहीं था
 
भटके नहीं कभी मेले में, हर इक राह मिली पहचानी
क्योंकि किसी ने पथ दिखलाने, हाथ हमारा गहा नहीं था
 
खुली हवा में नग्मे गाती, आज कलम लिखती अफ़साने
कल तक जो प्रतिबन्ध लगा था, आज शेष वो रहा नहीं था
 
अनुरूपा तुम जो लिखती हो, उसका शायद अर्थ नहीं है
पढ़ा सभी ने, पर होठों पर, लफ़्ज़ एक भी अहा नहीं था
 
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वज़्म में कोई सुनाये

हम गज़ल की गुनगुनी गरमाहटोम में जब नहाये
मीत तेरे चित्र उस पल पास आकर मुस्कुराये
झूमती पगडंडियों ने जब कदम चूमे हमारे
यों लगा पग के अलक्तक सामने आ मुस्कुराये
पत्तियों के जब झरोखों से हवा ने झांक देखा
घुंघरुओं की नींद टूटी, कसमसाये झनझनाये
ख्वाब में रिश्ते हजारों दीप बन कर जल रहे थे
साजिशों की रोशनी में रह गये बस टिमटिमाये
जो कलम ने लिख दिया उस शेर की ख्वाहिश यही है
ढल सके वो इक गज़ल में, वज़्म में कोई सुनाये
अरुणिमा