फ़सल सुनहरी बो दी जाए

दिल की तड़पन, कसक सभी कुछ अब आंसू से धो दी जाये

फिर होठों पर मुस्कानों की फ़सल सुनहरी बो दी जाए

 

है तुमको उम्मीद अगर तो वो नहरें भी खोद सकेगा

पहले उसके हाथों में ला एक कुदाली तो दी जाये

 

सब कुछ लुटा बची है केवल रिश्तों की झीनी सी गठरी

अच्छा होगा ये गठरी भी अब राहों में खो दी जाये

 

हीरे हों सिक्के हों चाहे हो पत्थर का कोई टुकड़ा

कहलाती है भीख सदा जो बढ़ी आंजुरि को दी जाये

 

लिखते लिखते थकी कलम का केवल ये अरमान बचा है

शायद इक दिन कोई तवज़्ज़ो, उसकी गज़लों को दी जाये

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