आषाढ़ी मेघो की बिजली

आषाढ़ी मेघो की बिजली यों तो खूब कड़कती है
प्यासों को पानी देने का जतन कहां पर करती है
 
बचपन में दादी ने जो था कहा आज वो सत्य हुआ
जितनी खाली होती गगरी, उतनी और छलकती है
 
सपने फिर से हरियाली के बहला देते आंखों को
भोलेपन को चतुराई से यहां चतुरता छलती है
 
हम अंधियारे के आदी तो हुए नहीं हैं मर्जी से
दीपक की बाती ही चुन कर अंगनाई को जलती है
 
मकते से मतले की दूरी तय करने में पांव थके
बनी गीतिकायें ही केवल, गज़ल कहां पर बनती है 
 
Advertisements