हम भी तो हैं दीवाने

जाने कितने लोग हुए हैं इन गज़लों के दीवाने

दीगर है ये बात  मान ले कोई, चाहे न माने

देती है तारीख गवाही, ऐसे दीवाने पन की

इसने ही तो लिखवाये हैं वर्क  वर्क पर अफ़साने

खतावार है कौन ? सवाली होना होता आसां है

शमा नहीं तो कुरबानी को जायें कहां पर परवाने

सुखनवरी की इन गलियों में हम भी आवारा घूमे

रहे निभाते हर इक दर से हँसते हँसते याराने

मुट्ठी भर भर धूप समेटी, बिखराई थाली भर भर

अपने पास रखा न कुछ भी, आये अँधेरे समझाने

आईने की तफ़सीलों में क्या क्या ढूँढ़ें, कोई कहे

जिस कोने से देखें, हमको दिखते केवल अनजाने

नायाब हैं हम

कहने को कोई बात नहीं, पर बात है कुछ बेताब हैं हम

अपना ही पता मिल न पाया क्या बात है क्यों नायाब हैं हम

पलकों के दरीचे में बैठे, बस राह निहारा करते हैं

पैबस्त न होते आंखों  में, कुछ ऐसे टूटे ख्वाब हैं हम

सर से छत उड़ी सहारे की दीवारें भी सब ध्वस्त हुईं

पर हिले न अपनी जड़ से जो दालानों के महराब हैं हम

है एक दायरा जीने का जिससे हम निकले नहीं कभी

है और किसी से काम नहीं, मावस्या के महताब हैं हम

सहरा की धूलों में लिपटे हैं सभी आबले पांवों के

राहें तबील सूखे लब हैं चलते रहते बेआब हैं हम

अत्तार की गली से

वो एक झोंका लगा था आया यहां पे अत्तार की गली से

जो पूछा, बोला लगा के दस्तक तुम्हारे दर पर इधर बढ़ा है

तुम्हें ये शायद खबर नहीं है, मगर बताती है ये शाहकारी

बड़ी ही फ़ुरसत से ये मुजस्सिम,खुदा के हाथों गया गढ़ा है

न आई होली, न महकी सरसों न फूले टेसू, न संवरी बौरें

मगर फ़िज़ां पे अजीब सा ये खुमार फिर भी लगा चढ़ा है

ये गेसुओं से गिरा है गौहर, या दीद-ए-तर का कोई मोती

जो खिल रहा है कँवल के लब पर, कहां से कोई कहो झड़ा है

न फूल खिलते, न भंवरे गूंजें, न उड़ती तितली, न चहके चिड़िया

न जाने कब से खिज़ां को ओढ़े, ये एक गुलशन यहां खड़ा है

दीपक नहीं जले

दीवाली तो आई लेकिन दीपक नहीं जले

ऐसे जमे हुए रिश्ते थे, जरा नहीं पिघले

जिनसे परिचय नहीं हुए वे दुश्मन भी तो क्या

शिकवा उनसे है सीने में जो दिन रात पले

दोपहरी  की   धूप   गंवाई   इंतज़ार लेकर

अहसासों पर जमी हुई थोड़ी तो बर्फ़ गले

एक बार भी मुड़ कर उसने हमें नहीं देखा

हम अपने साये के पीछे सारी उम्र चले

रीत पुरानी थी जिसको हम छोड़ नहीं पाये

सूरज  इन गलियों में आकर हर इक बार ढले

उमस भरी तन्हाई , चिपचिप दूर नहीं होती

सुधि यादों के पंखे को अब कितना और झले

शीश नवा कर हम भी ये बस दुहरा देते हैं

करमों की ये गति है शायद, टाले नहीं टले

दुनिया को मुस्कान बाँट कर दर्द पिया करते

अंधियारे का घर होता है हरदम दीप तले

अब न उमड़ता है आंखों में आंसू का कतरा

सीने पर आ पीड़ा चाहे जितनी मूँग दले.

सोता रह गया

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जो न होना था यहां, बस वो ही होता रह गया

मुस्कुराना था जिसे, वो सिर्फ़ रोता रह गया

काफ़िले दहलीज तक आये व आगे बढ़ गये

और वो गफ़लत का मारा सिर्फ़ सोता रह गया

अब्र बरसे ख्वाब के हर रात ही दालान में

एक वो था, नींद के बस बीज बोता रह गया

शेख ने तस्वीह जो दी, टूट कर वो गिर गई

प्रार्थना में वो महज मनके पिरोता रह गया

दाग सीने पर लगा, इस बात को जाना नहीं

रात दिन अपनी कबा को सिर्फ़, धोता रह गया

मर गई है आखिरी उम्मीद भी इस दौड़ में

उड़ न पाया हाथ में जो एक तोता रह गया

शायरी की दाद देगी वज़्म ये, यह सोचकर

नज़्म में अल्फ़ाज़ इक शायर समोता रह गया

खंज़र उतर गया

सीने में उसकी बात का खंज़र उतर गया

इक देवता था जो मेरे भीतर वो मर गया

शुबहों की गुफ़्तगू बढ़ी है इस कदर यहाँ

बेखौफ़ जो था , वो महज साये से डर गया

वो इक शजर कि जिससे थी उम्मीद छांह की

पुरबाई क्या चली कि वो जड़ से उखड़ गया

राहों को  नापने में लगे रह   गये         कदम

मंज़िल का ख्वाब टूट कर, गिर कर बिखर गया

सरहद से दे रही थी सदा मादरे वतन

कैसा अजीब शख्स था, कलियों पे मर गया

कुछ टूटा था

लम्हे भर में एक दहाई का रिश्ता झट से टूटा था

मैं हैरां थी रही सोचती वो  मुझसे क्योंकर रूठा था

मेरे घर की छत पर से जो बिन बरसे फिर से गुजरा है

उस बादल की  खता नहीं है, मेरा ही न्यौता झूठा था

जो हासिल को अपनी कुव्वत का रह रह दे नाम रहे

उनको खबर नहीं बिल्ली के भागों से छींका टूटा था

कितनी भोली है, पागल है सब जिसको कहते हैं जनता

फिर से उसका पांव पूजती कई बरस जिसने लूटा था

थी नादान अरुणिमा कल भी, ऐर आज भी  बदल न पाई

वो अब तक वट समझी जिसको छुईमुई वाला बूटा था

अश्क आंखों के रीत जाते हैं

यों ही हम जहमतें उठाते हैं

चन्द अशआर गुनगुनाते हैं

वे बताते हैं राह दुनिया को

अपनी गलियों को भूल जाते हैं

लेते परवाज़ नहीं अब ताईर

सिर्फ़ पर अपने फ़ड़फ़ड़ाते हैं

पांव अपने ही उठ नहीं पाते

वे हमें हर लम्हे बुलाते हैं

आप कहते हैं- क्या कलाम लिखा ?

और हम हैं कि मुस्कुराते हैं

जिनको दरिया डुबो नहीं पाया

एक चुल्लू में डूब जाते हैं

उसके होठों की मय कभी पी थी

उम्र गुजरी है, लड़खड़ाते हैं

एक तस्वीर का सहारा ले

अपनी तन्हाईयां बिताते हैं

दर्द सीने में जब भी उठता है

ढाल लफ़्ज़ों में हम सुनाते हैं

अरुणिमा

हम भी गज़ल लिखे

ज़माने भर का चलन है ऐसा खराब, हम भी गज़ल लिखें हैं

जिसे भी देखो वही कहे है जनाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

न लालो-गुल है न मीनो-सागर,न है तबस्सुम जरा लबों पर

न जाने कोई, कहां पे छलकी शराब, हम भी गज़ल लिखे हैं

उठी हैं नजरें जिधर से गुजरे,है बात दीगर कोई न बोले

मगर छुपाये कहां हुपे है शबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

हमें खबर है हमें न आता सुखनवरी का ये फ़न तुम्हारा

यहां किसी ने दिया न हम पर दबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

तुम्हारी उम्मीद से अधिक हो किया है इज़हार जो ये हमने

तुम्हारी नजरों में ये बनेगा अजाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

तुम्हारी महफ़िल में कोई परदा नहीं गवारा है शायरी में

इसीलिये तो उठाई हमने नकाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

जिन्हें ये दावा गज़लसरा हैं, न उनके जैसा लिखे है कोई

बने हैं हड्डी, जहां बना है कबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

हमारी लफ़्ज़ों को अपना कह के सुना रहे हैं जो बज़्म में वे

उन्हीं की खातिर किया है हमने सबाब, हम भी गज़ल लिखे हैं

ये बरसात

आलिंगन में सुलगे तन की यादों वाली ये बरसात

भीगे कपड़े,  सुलगे तन को देती गाली ये बरसात

अमराई में खनकाती सी चूड़ी चढ़ती पींगों में

टपक रही छत से भरती है बर्तन खाली ये बरसात

चाँद रात से महकाती सी कुछ सपने कुछ आंखों में

लाती है पहाड़ सी लम्बी, रातें काली ये बरसात

खिड़की पर बादल का टुकड़ा संदेशे ले भेज रही

ठंडे चूल्हे, उमड़ी बाढ़ें, नजर सवाली ये बरसात

उफ़ ये मस्त बनाती मन को ठंडी ठंडी बौछारें

जाने कितनी बार और खेलेगी पाली ये बरसात