पत्थर बहुत सारे

उड़ रहे हैं अब हवा में पर बहुत सारे

झुक रहे हैं पांव में अब सर बहुत सारे

क्या वज़ह थी कोई भी ये जान न पाया

बस्तियों में जल रहे हैं घर बहुत सारे

एक दो हों तो मुनासिब, सामना कर लें

ज़िन्दगी के सामने हैं डर बहुत सारे

हो नहीं पाया नफ़े का कोई भी सौदा

एक तनख्वाह और उस पर कर बहुत सारे

एक आंधी, एक तूफ़ां, एक है बारिश

इक दिलासा, हैं यहां छप्पर बहुत सारे

इल्तिजायें सब अधूरी ही रहीं आखिर

एक मज़नूं और हैं पत्थर बहुत सारे

चल रहे हैं राह में रंगीन ले हसरत

चुभ रहे हैं  पांव में कंकर बहुत सारे

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राम नहीं हो

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नाम ढूँढ़ते हैं इक ऐसा, जैसा कोई नाम नहीं हो
सूरज निकले दोपहरी हो, लेकिन उसकी शाम नहीं हो
हमसे  सबको उम्मीदें हैं, जुदा नहीं हो तुम भी इससे
हम तो बन जायेंगे लक्षमण, लेकिन तुम ही राम नहीं हो
किस्सागोई की आदत तो साथ रही अपने सदियों से
लेकिन फिर भी ये चाहा है सारे किस्से आम नहीं हो
ज़ुल्फ़ों के घिर आये साये तो फिर हुई आरज़ू मन में
घटा घिरी ही रहे इस तरह, और कभी भी घाम नहीं हो
उनकी यादों ने यों घेराने घेरा आकर के मेरी गलियों को
ऐसा लम्हा ढूँढ़ रहे हैं जब हाथों में जाम नहीं हो

आज सुना जाते हैं

वो लिख देते रोज और हम कभी कभी ही लिख पाते हैं
वो कहते हर बात, हमें क्या कहना सोच नहीं पाते हैं
टकसाली सिक्कों की तो बहुतायत मिलती गली गली में
कारीगरी मिले जिनमें वे कभी कभी ही मिल पाते हैं
एक और शायर कलाम पढ़ गया ज़ीस्त की महफ़िल में आ
आगे  आने   वाले   देखें   क्या    क्या   नज़राने लाते हैं
जो  मशाल ले    राहनुमाई    की     बातें करते रहते हैं
शाम ढले पर चौराहों के वे ही दिये बुझा जाते हैं
कल ये मौसम हो या न हो, कल ये चज़्म रहे या उजड़े
यही सोच कर हाले दिल हम अपना आज सुना जाते हैं

हम भी तो हैं दीवाने

जाने कितने लोग हुए हैं इन गज़लों के दीवाने

दीगर है ये बात  मान ले कोई, चाहे न माने

देती है तारीख गवाही, ऐसे दीवाने पन की

इसने ही तो लिखवाये हैं वर्क  वर्क पर अफ़साने

खतावार है कौन ? सवाली होना होता आसां है

शमा नहीं तो कुरबानी को जायें कहां पर परवाने

सुखनवरी की इन गलियों में हम भी आवारा घूमे

रहे निभाते हर इक दर से हँसते हँसते याराने

मुट्ठी भर भर धूप समेटी, बिखराई थाली भर भर

अपने पास रखा न कुछ भी, आये अँधेरे समझाने

आईने की तफ़सीलों में क्या क्या ढूँढ़ें, कोई कहे

जिस कोने से देखें, हमको दिखते केवल अनजाने

नायाब हैं हम

कहने को कोई बात नहीं, पर बात है कुछ बेताब हैं हम

अपना ही पता मिल न पाया क्या बात है क्यों नायाब हैं हम

पलकों के दरीचे में बैठे, बस राह निहारा करते हैं

पैबस्त न होते आंखों  में, कुछ ऐसे टूटे ख्वाब हैं हम

सर से छत उड़ी सहारे की दीवारें भी सब ध्वस्त हुईं

पर हिले न अपनी जड़ से जो दालानों के महराब हैं हम

है एक दायरा जीने का जिससे हम निकले नहीं कभी

है और किसी से काम नहीं, मावस्या के महताब हैं हम

सहरा की धूलों में लिपटे हैं सभी आबले पांवों के

राहें तबील सूखे लब हैं चलते रहते बेआब हैं हम

अत्तार की गली से

वो एक झोंका लगा था आया यहां पे अत्तार की गली से

जो पूछा, बोला लगा के दस्तक तुम्हारे दर पर इधर बढ़ा है

तुम्हें ये शायद खबर नहीं है, मगर बताती है ये शाहकारी

बड़ी ही फ़ुरसत से ये मुजस्सिम,खुदा के हाथों गया गढ़ा है

न आई होली, न महकी सरसों न फूले टेसू, न संवरी बौरें

मगर फ़िज़ां पे अजीब सा ये खुमार फिर भी लगा चढ़ा है

ये गेसुओं से गिरा है गौहर, या दीद-ए-तर का कोई मोती

जो खिल रहा है कँवल के लब पर, कहां से कोई कहो झड़ा है

न फूल खिलते, न भंवरे गूंजें, न उड़ती तितली, न चहके चिड़िया

न जाने कब से खिज़ां को ओढ़े, ये एक गुलशन यहां खड़ा है

दीपक नहीं जले

दीवाली तो आई लेकिन दीपक नहीं जले

ऐसे जमे हुए रिश्ते थे, जरा नहीं पिघले

जिनसे परिचय नहीं हुए वे दुश्मन भी तो क्या

शिकवा उनसे है सीने में जो दिन रात पले

दोपहरी  की   धूप   गंवाई   इंतज़ार लेकर

अहसासों पर जमी हुई थोड़ी तो बर्फ़ गले

एक बार भी मुड़ कर उसने हमें नहीं देखा

हम अपने साये के पीछे सारी उम्र चले

रीत पुरानी थी जिसको हम छोड़ नहीं पाये

सूरज  इन गलियों में आकर हर इक बार ढले

उमस भरी तन्हाई , चिपचिप दूर नहीं होती

सुधि यादों के पंखे को अब कितना और झले

शीश नवा कर हम भी ये बस दुहरा देते हैं

करमों की ये गति है शायद, टाले नहीं टले

दुनिया को मुस्कान बाँट कर दर्द पिया करते

अंधियारे का घर होता है हरदम दीप तले

अब न उमड़ता है आंखों में आंसू का कतरा

सीने पर आ पीड़ा चाहे जितनी मूँग दले.