दीपक नहीं जले

दीवाली तो आई लेकिन दीपक नहीं जले

ऐसे जमे हुए रिश्ते थे, जरा नहीं पिघले

जिनसे परिचय नहीं हुए वे दुश्मन भी तो क्या

शिकवा उनसे है सीने में जो दिन रात पले

दोपहरी  की   धूप   गंवाई   इंतज़ार लेकर

अहसासों पर जमी हुई थोड़ी तो बर्फ़ गले

एक बार भी मुड़ कर उसने हमें नहीं देखा

हम अपने साये के पीछे सारी उम्र चले

रीत पुरानी थी जिसको हम छोड़ नहीं पाये

सूरज  इन गलियों में आकर हर इक बार ढले

उमस भरी तन्हाई , चिपचिप दूर नहीं होती

सुधि यादों के पंखे को अब कितना और झले

शीश नवा कर हम भी ये बस दुहरा देते हैं

करमों की ये गति है शायद, टाले नहीं टले

दुनिया को मुस्कान बाँट कर दर्द पिया करते

अंधियारे का घर होता है हरदम दीप तले

अब न उमड़ता है आंखों में आंसू का कतरा

सीने पर आ पीड़ा चाहे जितनी मूँग दले.

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सोता रह गया

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जो न होना था यहां, बस वो ही होता रह गया

मुस्कुराना था जिसे, वो सिर्फ़ रोता रह गया

काफ़िले दहलीज तक आये व आगे बढ़ गये

और वो गफ़लत का मारा सिर्फ़ सोता रह गया

अब्र बरसे ख्वाब के हर रात ही दालान में

एक वो था, नींद के बस बीज बोता रह गया

शेख ने तस्वीह जो दी, टूट कर वो गिर गई

प्रार्थना में वो महज मनके पिरोता रह गया

दाग सीने पर लगा, इस बात को जाना नहीं

रात दिन अपनी कबा को सिर्फ़, धोता रह गया

मर गई है आखिरी उम्मीद भी इस दौड़ में

उड़ न पाया हाथ में जो एक तोता रह गया

शायरी की दाद देगी वज़्म ये, यह सोचकर

नज़्म में अल्फ़ाज़ इक शायर समोता रह गया

खंज़र उतर गया

सीने में उसकी बात का खंज़र उतर गया

इक देवता था जो मेरे भीतर वो मर गया

शुबहों की गुफ़्तगू बढ़ी है इस कदर यहाँ

बेखौफ़ जो था , वो महज साये से डर गया

वो इक शजर कि जिससे थी उम्मीद छांह की

पुरबाई क्या चली कि वो जड़ से उखड़ गया

राहों को  नापने में लगे रह   गये         कदम

मंज़िल का ख्वाब टूट कर, गिर कर बिखर गया

सरहद से दे रही थी सदा मादरे वतन

कैसा अजीब शख्स था, कलियों पे मर गया